
"मुन्नी बदनाम हूई डार्लिंग तेरे लिये’’ यार! है तेरे मोबाईल में ये गाना, प्लीज ब्लूटूथ से सैंड कर ना।’’ यह किस्सा् मैं मेरे दोस्त शेखर का है। ऐसे कई वाकये हमारी ज़िदगी में आमतौर पर घटित होते हैं, मगर हम इन पर ध्यान नहीं देते हैं क्योंकि यह हमारी ज़िदगी का एक हिस्सा बन गये हैं। अगर हम भारत के इस संचार क्रांति युग से थोड़ा पीछे हरित क्रांति के युग में जाकर सोचे कि क्या इस तरह कल्पनाएँ उस समय लोगों द्वारा की जा सकती थी। जी हाँ, आज का यह संचार आधारित युग तत्कालीन समाज की कल्पना का ही प्रतिफल है।
संचार क्रांति ने हमें चूहे की आकृति का ऐसा दोस्त दिया है जिसके बगैर अब जीवन के बारे में सोचना भी मुमकिन नहीं है। जी हाँ, अब तो आप समझ ही गये होंगे कि यह चूहे की आकृति का हमारा दोस्त कोई और नहीं बल्कि हमारा मोबाइल फोन है। जिसने आज हमारे बीच की दूरियाँ को केवल कम ही नहीं किया, बल्कि हमें हर वक़्त एकदूसरे से जोड़े रखता है। यकीन मानिए इस मोबाइल फोन का संग ठीक "दोस्ती" फिल्म के अंधे -लंगड़े और "शोले" के जय-वीरू की दोस्ती को भी मात दे सकता है। मोबाइल जहाँ हमारे लिए एक प्यारा दोस्त है वहीं दूसरी तरफ यह उतना ही ख़तरनाक दुश्मन भी है। कॉलेज गर्ल नेहा की कुछ आपित्तजनक तस्वीरे इंटरनेट और दोस्तों के मोबाईल फोन पर मिली तो वो हैरान हो गई। मगर जल्द ही उसे याद आ गया कि यह तस्वीरे उसके पुराने प्रेमी ने अपने मोबाईल फोन से खिंची थी। इस तरह की घटनाओं से समाचार पत्र और न्यूज चनैल सरोबार नज़र आते हैं। आज आंतकवादियों, बड़ेबड़े माफियाओं से लेकर गली के गुड़े तक भी अलगअलग नम्बरों का प्रयोग कर लोगों को धमकाते हैं और अपने कारनामों को अंजाम तक पहुँचाते हैं। आज हर प्रकार की गतिविधी में मोबाईल का फोन का एक अहम् भूमिका अनिवार्य रूप में होती है। सर्वविदित निठारी कांड और आरूषि तलवार हत्याकांड में भी मोबाईल फोन के सहारे ही गुनहगारों को गिरफ्तार किया गया था। कुछ चालाक छात्र इसका प्रयोग परीक्षा में नकल करने के लिए करते हैं तो कुछ लड़कियों को अलग-अलग नम्बरों से फोन करके परेशान करते हैं। यह सारे कारनामे भी मोबाईल फोन के मदद ही किये जाते हैं।
मोबाईल फोन के कुछ ऐसे अनचाहे शारीरिक नुकसान हैं जिन्हें आप चाहकर भी रोक नहीं सकते हैं। कुछ दिनों पहले एक कैंसर रिसर्च इंस्टीटयूट के विशेषज्ञों की टीम ने घोषणा की थी कि मोबाइल का ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल का कारण बन सकता है। इस संबंध में यूनिवर्सटी ऑफ पिट्सबर्ग कैंसर इंस्टीटयूट के डायरेक्टर डॉ. रोनाल्ड हर्बरमैंन ने अपने ही कर्मचारियों को एक संदेश भेजकर इस बात की जानकारी दी और उन्हें बेवजह मोबाइल इस्तेमाल करने से मना किया है। इस संबंध में शोधकर्ताओं द्वारा 10 सूत्री सलाह पेश की गई है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को बहुत ज़्यादा ज़रूरी होने पर ही मोबाइल का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि मोबाइल से निकलने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन उनके ब्रेन टिश्यू को जल्दी प्रभावित करता है। इसके अलावा जहाँ तक संभव हो मोबाइल को अपने शरीर के करीब नहीं रखना चाहिए, खासतौर से सोते वक्त। मोबाइल को चार्जिंग में लगाकर कभी भी बात नहीं करनी चाहिए। मोबाइल को सिर की मदद से कंधे पर दबा कर लगातार बात करने से गर्दन में कई परेशानियाँ पैदा हो सकती है।
लिहाजा यह कहा जा सकता है कि मोबाइल को लेकर इंसान की हालात ठीक उस तरह की हो गई है कि मोबाइल आस्तीन में छुपे उस सांप की तरह है जो दिखाई नहीं देता है। आजकल मोबाइल से किये जाने वाले प्यार ने इंसान को उस दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ आगे कुआँ और पीछे खाई है। लेकिन फिर भी मोबाईल से हम पूरी तरह मूँह नहीं मोड सकते हैं क्योंकि यह आज हमारी आवश्यक आवश्यकता बन गई है जिसके बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है ।
