- कोई विषय न मिलना (Blogger’ block) : कभी कभी ऐसा होता है कि आप चिठ्ठाकारी करते करते उब जाते हैं और आप को कोई नया विषय ही नहीं सूझता जिस पर आप लिख सकें। यह ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी समस्या है जिसको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।
- आपके विषय पर किसी और का लिखा जाना : यह तब होता है जब आप किसी विषय पर लिखने की सोच रहे होते है पता चलता है कि किसी अन्य चिठ्ठाकार ने उसी विषय पर बहुत ही अच्छा लिख मारा है तो आप का सारा उत्साह काफूर हो जाता है।
- ऑफिस में लोगो द्वारा निगाह रखना : जो लोग अपने ऑफिस से छिप कर ब्लाग लिखते हैं उनको ये परेशानी रहती है किसा को पता न चल जाय या फिर कोई देख न ले या फिर किसी दिन कुछ अच्छा लिखने का मन है, विषय भी तैयार है पर उसी दिन ऑफिस में काम ज्यादा आ गया या फिर कोई आप से ऑफिस में मिलने आ गया या बॉस ने बुला लिया तो गई उस दिन की ब्लॉगिंग!
- बिजली का जाना : आप ब्लॉगिंग के लिये तैयार हैं, धांसू सा विषय भी सोच लिया लेकिन जैसे ही कंप्यूटर ऑन किया कि बिजली चली गई। दिल्ली, मंबई की बात अलग है, बाकी देश में कोई गारंटी नहीं है कि कब बिजली आयेगी। ऐसे में लैपटॉप से थोड़ा बहुत काम चल सकता है लेकिन पूरा नहीं।
- इंटरनेट कनेक्शन डाउन होना : आप ने सब कुछ कर लिया। विषय चुन लिया, उस पर मैटर टाईप भा कर लिया कर लिया, और जैसे ही पोस्ट करने बैठे कि पता चला इंटरनेट कनेक्शन डाउन हो गया। अब भुनभुनाते रहिये। ये समस्या सबसे ज्यादा बीएसएनएल (BSNL) के साथ आती है।
- रिश्तेदारों का आना : जैसे ही आप ब्लॉगिंग के लिये अपने आप को तैयार करते है कि पता चलता है पड़ोस के लोग या रिश्तेदार आपसे मिलने के लिये चले आये हैं और आपका पूरा समय सामाजिकता निभाने में ही चला जाता है।
- बच्चों का लढियाना : किसी किसी दिन बच्चे भी आपको दिन भर घेरे रहते हैं और आप ब्लॉगिंग नहीं कर पाते हैं। जिनके बच्चे छोटे हैं उनके साथ तो और भी ज्यादा परेशानी है।
- कमाई न होना : ऐसा हिन्दी व अन्य भाषाओं के चिठ्ठाकारों के साथ ज्यादा होता है। अपने ब्लॉग से किसी भी प्रकार की कोई कमाई न होने से भी चिठ्ठाकार का उत्साह खत्म हो जाता है और वो ब्लॉगिंग छोड़ देता है।
- टिप्पणी न मिलना : ये समस्या हिन्दी ब्लॉगिंग में कुछ ज्यादा है , यहां अगर किसी ब्लॉगर को प्रशंसा वाली टिप्पणियां न मिले तो उसको लगता है कि उसके लेखन किसी ने देखा ही नहीं और वो ब्लॉगिंग के प्रति निराश हो जाता है।
Thursday, January 27, 2011
ब्लॉगिंग
अंग्रेजी नामों वाली हिंदी फिल्में
अगर आप ने गौर किया हो तो शायद ये देखा हो कि आजकल प्रदर्शित होने वाली अधिकांश फिल्मों के नाम अंग्रेजी में हैं। पिछले कुछ दिनों में रिलीज हुई फिल्मों में वांटेड, ऑल द बेस्ट, ब्ल्यू, वेक अप सिड, फ्रूट एंड नट, डू नॉट डिस्टर्ब इत्यादि प्रमुख हैं। हालांकि पहले भी ऐसी फिल्में पहले भी बनती रही है लेकिन पिछले कुछ समय से इस तरह की अंग्रेजी नाम वाली फिल्में कुछ ज्यादा ही बन रही हैं। अपनी कॉमेडी फिल्मों के लिये प्रसिद्ध डेविड धवन अंग्रेजी नाम का इस्तेमाल काफी समय से कर रहे हैं उनकी कई फिल्मों के नाम इसी तरह के थे जैस् कि कुली नंबर वन, आंटी नंबर वन, हीरो नंबर वन, बीबी नंबर वन, पार्टनर, लोफर, डू नॉट डिस्टर्ब इत्यादि रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक मधुर भंडारकर की तो हर फिल्म का नाम अंग्रेजी का होता है। उन्होनें अब तक चांदनी बार, पेज थ्री, कॉरपोरेट, ट्रैफिक सिगनल, फैशन आदि बनाई हैं जो कि अंग्रेजी नामों की है और अब वो एक और फिल्म जेल लेकर आ रहे हैं। आने वाली कुछ फिल्में भी इसी तरह से आखिर क्या कारण है इस तरह से फिल्में बन रही है। कुछ बातें इस बात का शायद जबाब दे सकें
- हिंदी फिल्में अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज होती हैं और अंग्रेजी नाम से थोड़ा फायदा मिल सकता है। हिंदी फिल्मों की अधिकांश कमाई प्रवासी भारतीयों द्वारा फिल्में देखने से होती है, लिहाजा उन्हीं के हिसाब से फिल्में बनती हैं।
- इससे ये भी पता चलता है कि भारत में मल्टीप्लेक्स में फिल्मे देकने वाले मध्यम और उच्च वर्ग के लिये ही फिल्में बन रही हैं
- ये भी पता चलता है कि देश के अंदर के देसी और अंदर के इलाकों के लोगों की समस्याओं और उससे संबंधित फिल्में अब कम बनने लगी हैं।
- भारत में अंग्रेजी की स्वीकार्यता भी इससे पता चलती है।
मेरे विचार में अपवाद के रुप में तो अंग्रेजी नाम वाली हिंदी फिल्में तो ठीक हैं लेकिन अगर ये बहुतायत से होने लगे तो खतरे की घंटी है। हमें समय रहते चेत जाना चाहिये।
हिंदी फिल्म
- हीरो हमेशा फर्स्ट क्लास फर्स्ट पास होता है और हमेशा BA करता है। MA तो कभी भी नहीं। आजकल की फिल्मों में थोड़ा परिवर्तन हुआ है अब हीरो MBA करता है।
- अमीर प्रवासी भारतीय लड़के (हीरो) का नाम अधिकतर राज, आर्यन या राहुल होता है।
- भारत के किसी भी जगह के गांव की कहानी हो, वहां की बोली हमेशा पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों की होती है।
- गांव की गोरी (हीरोईन) हमेशा चोली घाघरा ही पहनती है और उस पर हमेशा ही जमींदार या उसके बेटे की गंदी निगाह होती है।
- गांव में रिटार्यड फौजी होता है जो बात बात में डींगें मारता है।
- कहानी अगर शहर की तो रिटार्यड फौजी न होकर रिटार्यड कर्नल होगा जिसकी घनी मूंछें होती हैं और वो बात बात में गोली मारने की बात करता है तथा बर्मा की लड़ाई (कब हुई थी?) की कहानी सुनाता है।
- अगर फिल्म में दो हीरो हों तो दोनो एक ही लड़की को चाहेंगे, दोनों ही एक दूसरे के लिये अपना प्यार कुर्बान करने को तैयार रहते हैं।
- दो हीरो वाली फिल्मों में, दोनों हीरों में एक बार गलतफहमी तथा लड़ाई अवश्य होगी, यह लड़ाई हमेशा बराबरी पर छूटती है। अगर चाकू का इस्तेमाल इस लड़ाई में हो रहा है तो पहले एक हीरो की आंख या गर्दन तक चाकू जायेगा, फिर दूसरे हीरो की आंख और गर्दन तक।
- हीरो चाहे जो करता हो, वो कार चला सकता है तथा जरुरत पड़ने पर हैलीकॉप्टर तथा हवाई जहाज उड़ा सकता है।
- पुलिस हमेशा फिल्म के अन्त में आती है।
- विलेन पूरी फिल्म में मौज करता है तथा कोई भी बात करते समय या गलत काम करते समय जोर जोर से हंसता रहता है।
- अगर विलेन ऊंचे से या खास तौर पर हैलीकॉप्टर से भागते हुये हीरो पर गोली बरसाता है तो गोलियां हीरो के दोनो ओर लाइन बनाती हई गिरती हैं लेकिन हीरो को एक भी नहीं लगती है, अगर हीरो नीचे हैलीकॉप्टर पर निशाना लगाये तो एकदम निशाना लगता है। ये बात हॉलीवुड की फिल्मों पर भी लागू होती है।
- हिन्दी फिल्मों के विलेन को फाईटिंग नहीं आती है।
- हीरो जब विलेन को मार मार कर बाजी जीत रहा होता है तभी पता नहीं क्यों हीरो की हीरोईन, बहन एवं मां वहां आ जाती हैं जिन्हे विलेन के आदमी पकड़ लेते हैं तथा बाजी पलट जाती है।
- विलेन के नाम डागा, जेके, संग्राम, जगताप, शक्ति, राका, लॉयन होते हैं और उनके नीचे के गुन्डों के नाम शंकर, जग्गू, राबर्ट, माइकल, रघू, राजा इत्यादी होते हैं। विलेन की महिला साथियों के नाम रीटा, मोना, सोनिया तथा मोनिका होते हैं। ये महिलायें मन ही मन हीरो को चाहती हैं तथा जब विलेन हीरो पर गोली चलाता है तब बीच में आकर अपनी जान दे देती हैं।
- दारु का अड्डा हमेशा माइकल का होता है।
- विलेन का साथ देने वाले नेता कार्टून टाईप के होते हैं और हमेशा बिहारी बोलते हैं।
- पुरानी फिल्मों में जज साहब कोई फैसला सुना रहे होते थे तभी अदालत के दरवाजे के पास से कोई जोर से चिल्लाता था "ठहरो! जज साहब..."।
- विलेन की बहन या बेटी हीरो से प्यार करती है और इसको लेकर हीरो और विलेन में तनातनी रहती है।
- अगर विलेन कोई खतरनाक काम के मंसूबे बना रहा होता है या कोई बड़ी प्रयोगशाला टाईप की जगह होती है तो विलेन हीरो को अपने जाल में फंसा हुआ जानकर अपना पूरा प्लान बता देता है, या पूरी प्रयोगशाला घुमाकर सब कुछ बता देता है।
- विलेन हीरो को यह भी बता देता है कि उसके बाप का हत्या उसी ने की थी।
- कॉलेज के प्रोफेसर हमेशा कार्टून टाईप के होते हैं जो कि साथी महिला प्रोफेसरों को पटाने की कोशिश करते रहते हैं।
- कॉलेज का दादा हमेशा कॉलेज के ट्रस्टी का लड़का होता है, जो कि प्रिंसीपल को हमेशा धमकाता रहता है।
- देवर हमेशा भाभी का लाड़ला होता है तथा अपना प्रेमिका के बारे में सब से पहले भाभी को ही बताता है, वो भी पहली बार में ही उस लड़की को पसन्द कर लेती है।
- बुजुर्ग नौकर हमेशा रामू काका होता है।
- सस्पेंस फिल्मों में जिस पर शक दिखाया जाता है, वो कभी अपराधी नहीं निकलता तथा कई बार तो उसी का कत्ल हो जाता है।
- सस्पेंस फिल्मों में या खौफनाक फिल्मों में एक बूढ़ा चौकीदार होता जो कंबल ओढ़े रहता है और हाथ में लालटेन लेकर इधर से उधर घूमा करता है। इसका भी कत्ल हो जाता है।
- हीरो अगर पुलिस का इंस्पेक्टर होता है तो वो जेब में इस्तीफा निकाल कर कमिश्नर की मेज पर जब चाहे तब पटक देता है।
- पुलिस का इंस्पेक्टर हीरो गुन्डों के अड्डों पर अकेला ही जाता है और सब को मारकर हवालात में बंद कर देता है।
- शादी के सीन में छोटी लड़कियां हंसती हुई इधर से उधर भागती रहती हैं।
- हीरोईन बहू सुबह सुबह भजन गाती है। जबकि घर की बिगड़ी हुई औलादें पॉप म्यूजिक सुनती हैं।
- विलेन या उसके साथियों को यदि गोली लगती है तो तुरन्त ही मर जाते हैं, लेकिन यदि हीरो को गोली लगी और उसको मरना है तो वो बहुत देर तक डॉयलाग बोलता है।
- हीरो को यदि गोली लगेगी तो अस्पताल में डाक्टर हीरो के शरीर से गोली निकाल कर टीन के डब्बे में जोर से गिरायेगा।
और भी बहुत से ऐसे सीन हैं जो हमारी हिंदी फिल्मी में अक्सर दोहराये जाते हैं, सारे इस समय याद नहीं आ रहे हैं। याद आने पर यहां लिखता जाउंगा। यदि आप लोगों को भी ऐसे सीन पता हों तो बताइये, और यदि आप फिल्म बनाना चाहते हों तो यहां से कोई 10-15 सीन उठा लीजिये और अपनी फिल्म बना लीजिये
SMS.........
एसएमएस विज्ञापनों ने परेशान कर रखा है
बचें चकाचौंध वाले विज्ञापनों से
ऐसा लगता है कि घरेलु सामान के निर्माता हमको इस त्यौहारों के मौसम मे कुछ न कुछ सामान बेच कर ही मानेंगे। किसी भी समाचार पत्र को उठा लीजिये या फिर टीवी का कोई भी मनोरंजन या समाचार चैनल देख लीजिये, चकाचौंध वाले, कई प्रकार के लुभावने विज्ञापन हाजिर हैं। इस तरह के विज्ञापन इस कदर चकाचऔंध वाले कि अगर आप ने कभी एलसीडी टीवी (LCD TV) लेने के लिये नहीं सोचा हो तो सोचना शुरु कर देंगे, वाशिंग मशीन बदलने चाहे कोई इरादा न हो लेकिन इस बात पर कुछ गौर तो फरमाने ही लगते है।
आजकल विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रानिक व घरेलु सामान के निर्माता कई प्रकार की योजनायें लाकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। जिनमें कुछ इस प्रकार है -
- फ्री गिफ्ट – इस प्रकार की योजना में ग्राहक को ये बताया जाता है कि आपको सामान करीदने पर कुछ न कुछ मुफ्त उपहार मिलेगा। हालांकि ये बात अलग है कि ये उपहार कितना मुफ्त होता है और कितना मुख्य सामान की कीमत में शामिल होता है, दूसरी बात ये कि हो सकता है कि मुफ्त मिलने वाले समान में आप की रुचि न हो या फिर कई बार पुरानी पड़ चुकी (आउटडेटेड) वस्तुयें भी इस तरह की स्कीमों में चला दी जाती हैं।
- स्क्रैच कार्ड – इस तरह की योजना में ग्राहक को ये बताया जीता है कि खरीदने पर आपको एक कूपन मिलेगा जिसमें कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा और कुछ बड़ा भी निकल सकता है। अधिकांश समय इस तरह के कूपन में मिलने वाली वस्तु कोई मामूली सी होती है और बड़ा सामान किसी का नहीं निकलता है।
- लकी ड्रा – ये वाली योजना सबसे ग्राहक के लिये सबसे ज्याद बेकार होती है। बताया तो ये जाता है कि लाखो-करोंड़ों के इनाम निकलेंगे। लेकिन अधिकांश ग्राहक इतने लकी नही होते और दूसरी बात ये कि अगर किसी का इनाम निकला भी तो केवल एक को ही तो मिला, सभी ग्राहकों को तो कुछ भी नहीं मिला।
अत: इस तरह की किसी योजना में न फंस कर अपनी अक्ल का प्रयोग करके ही सामान खरीदना चाहिये और चकाचौंध वाले किसी भी विज्ञापन से प्रभावित नहीं होना चाहिये |