आप मेरे आज के ब्लॉग पोस्ट का शिर्षक देख कर सोच रहें होंगें कि ये क्या है ,अभी कल ही तो रिश्तो के बारे में इतना कुछ पढा था और आज फिर रिश्ता ? और साथ ही साथ पैसा भी । ये रिश्तों के बीच पैसा कहाँ से आ गया ? पर घबराईये नहीं इस विषय पर लिखने के लिये आज मेरे बहुत ही खाश मित्र अमरेश जी ने मुझसे कहा है । हुआ यूँ कि आज मैने अपने मित्र से कुछ अच्छे विषय के बारे मे पुछा जिसपर मैं कुछ लिख सकूँ तो उन्होने मुझे इस विषय पर लिखने के लिये कहा , जो मुझे बहुत ही प्यारा लगा । तथा इसके लिये मैं अमरेश जी का तहे दिल से धन्यवाद करता हूँ ।
यदि मैं आपलोगों से पुछूँ कि रिश्ता और पैसे में क्या संबंध है तो आप कहेंगे कि कुछ नही क्योंकि रिश्ते तो दिल से बनते है और भावनाओ के साथ जुड़ते है। पर उतना ही सच है कि रिश्तों को स्थाई रखने मे पैसे की अहम् भूमिका होती है।
चलिये इसे कुछ उदहारण के साथ समझने की कोशिश करते है। माना कि आपके किसी रिश्तेदार के यहाँ कोई पारिवारिक उत्सव है और आपको सपरिवार आमंत्रित किया गया है। आप अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए वहाँ नहीं जाने का निर्णय करते है। और लिजिए आरम्भ हो गया एक रिश्ते के कमजोर होने की शुरुआत। यहाँ आम तौर पर जवाब होता है कि अगर रिश्तेदार समझदार होगा तो स्थिति को समझ जाएगा? पर दुनिया मे समझदार कितने है?
माना आपके दोस्त को आपकी जरुरत है। उसने आपको बुलाया भी, पर आप आर्थिक कारणों से जाने मे असमर्थ है। आप अपने दोस्त को समझाते है पर वह इसे दुसरे तरीके से लेता है और एक दोस्ती मे दरार पड़ जाती है।
कई बार आर्थिक कारण अप्रत्यक्ष रूप से भी रिश्तों को प्रभावित करते है। और इस बात को तो मैंने ख़ुद के साथ अनुभव किया है। कुछ ऐसे रिश्ते जो मेरे लिए बहुत अहम थे बस आर्थिक स्थिति के कारण टूट गए। आज भी याद है जब मुझे बुलाया जा रहा था और मेरे से कहा गया कि अगर तुम नही आए तो शायद सब बिगड़ जाएगा। इसके बाद भी अपनी आर्थिक स्थिति के कारण मै नही जा सका और नतीजा मेरा सबसे अहम् रिश्ता टूट गया।
आज भी लगता है कि अगर मेरी आर्थिक स्थिति सही होती तो सब नही होता। अपने अच्छे समय मे बनाये गए कुछ रिश्तों को बुरे दौर मे बुरी तरह से टूटते हुए देखा है।
मुझे लगता है कि संबध और रिश्तो की विवेचना करते समय इसे भावनात्मक जुडाव और दिल से जुड़ी चीज मन कर आर्थिक कारक को गौण बनाना सही नही है। सम्बन्ध तभी तक स्थाई है जब तक आप उसे हर स्तर से बनाये रखने मे सक्षम है।चाहे वो मानसिक हो या आर्थिक ।
भागदौड़ भरी जिंदगी, फैशनेबल और स्टेट्ससिंबल का दिखावा बढ़ने के कारण ये त्योहार पुराने जमाने के रीति-रिवाजों को कहीं पीछे छोड़ आए हैं। आज इस बदलते युग ने बहनों की भी परिभाषा बदल दी है। आज बहनों के पास राखी बाँधने का टाइम भी नहीं होता है। तो वह पहले से भाइयों को फोन करके बता देती है कि 'मैं इस समय आऊँगी और इसी समय राखी बाँधकर तुरंत निकल जाऊँगी।'
रिश्ते की यह मजबूत डोर सिर्फ एक फैशन और कमाई का जरिया बनकर रह गई है। उसके पीछे रही भावनाएँ आज कहीं जाकर गुम हो गई है। आज का युग बदल जरूर गया है। लेकिन उसके साथ अगर त्योहारों के मायने भी बदलने लगे तो फिर क्या कहनें, उन रिश्तों का क्या जो दिल से निभाएँ जाते है सिर्फ पैसे और फैशन के बल पर नहीं। अगर त्योहार और रिश्तों का यह फेर इसी तरह बदलता रहा तो फिर कुछ शेष ही नहीं रह जाता।
आज के समय में कई जगहों पर ध्यान पैसे बचाने का होता है। जैसे कई घरों में यह भी होता है कि भाई के लिए मिठाई लानी हो तो बहन अपने नौकर को पैसे देकर कह देती है जाओ और दुकान पर जो सबसे सस्ती मिठाई हो लेकर आओ। महँगाई के युग में राखियों पर गिरी भावों की गाज से वहाँ पर भी हर तरह का सौदा किया जाता है। सस्ती से सस्ती राखी या कम से कम बजट वाली राखी ली जाती है। राखी के त्योहार का यह बदला हुआ रूप मनुष्य की भावनाओं से खिलवाड़ करता हुआ साफ तौर पर नजर आता है। आखिरकार त्योहार के पीछे जुड़ी भावनाओं का अपना अलग ही महत्व होता है। लेकिन क्या करें समयानुसार आए इस परिवर्तन से सभी के दिलों को झकझोर कर रख दिया है।
आज समय के अनुसार और समाज में बढ़ते पैसे की चलन के कारण राखी के रिश्ते और प्यार के इस बंधन का असर 'पैसे वालों के महलों और गरीबों के झोपड़ों' पर भी नजर आने लगा है। कल का ही एक सच्चाई भरा वाक्या पेश है- जहाँ एक गरीब और अमीर दिलों की रिश्तों की नजाकत बताती हुई सच्ची घटना।
" एक भैया-भाभी अपनी तीनों ननदों के यहाँ फोन करके राखी पर आने और खाना खाने के लिए आमंत्रित करती है। तीन भाई-तीन बहनों के बीच एक भाई कमाई के मामले में कमजोर वर्ग का हैं जिसके यहाँ से तीनों बहनों को सबसे पहले बुलावा दिया जाता है। उस समय उनमें एक ननद का यह कहना होता है कि सबसे छोटे भाई याने महलों वाले भाई के यहाँ बुलावा अभी तक तो आया नहीं है लेकिन अगर उनके यहाँ का बुलावा आ गया तो हम खाना वहाँ खा लेंगे। तुम्हारे यहाँ सिर्फ नाश्ता कर लेंगे। यह सुनकर उस गरीब भाई के पैरों तले जमीन खसक जाती है कि भाई तो सभी एक से हैं ! अगर कोई कम कमा रहा है तो क्या हुआ। उसकी कमाई से उन रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। और फिर जब तीनों भाइयों के यहाँ से पहला बुलावा अगर गरीब भाई ने कर दिया तो कौन-सा गुनाह हो गया। ''
पैसे की इस बदलती माया ने रिश्तों को भी अपनी जकड़ में ले लिया है। पैसे के आगे भाई का स्नेह भरा रिश्ता बहन को फीका लगने लगा है। उसे लगता है लखपति भाई के यहाँ खाना नहीं खाएँगे तो शायद उन्हें बुरा लग जाएगा लेकिन रिश्ते तो एक से होते हैं फिर क्या लखपति और क्या गरीब, दिल तो एक-सा ही होता है चाहे वह पैसे वाले को हो या गरीब का। उसमें फर्क करने जैसी कोई बात नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि इस दुनिया सबसे लंबे समय तक जो निरंतर चलता रहता है वह रिश्ता है। पैसा तो आज है कल नहीं है।
वैसे भी लक्ष्मी कभी एक जगह टिककर रहती कहाँ है। लेकिन रिश्ते वह होते है जो आपको जोड़े रखने के अलावा एक अंदरूनी संतुष्टि भी देते है। जिससे आम आदमी उन रिश्तों के बलबूते पर जीवन की हर जंग बड़ी आसानी से लड़ लेता है। काश ! दुनिया के इन अमीरों-गरीबों का फासला दूर हो जाए। और रिश्ते सही मायने में रिश्ते ही रहे तो फिर इस दिल की दुनिया वालों के उन रिश्तों के क्या कहने।
वास्तव में जिस दिन ऐसा कुछ होगा उस दिन इस दुनिया का रूप ही अलग-सा नजर आने लगेगा। और तभी सभी के दिलों को सुकून महसूस होगा कि रिश्ते की यह मजबूत डोर कभी किसी अमीर और गरीब के दिलों को पाट ना सकेंगी।
पैसे की इस बदलती माया ने रिश्तों को भी अपनी जकड़ में ले लिया है। पैसे के आगे भाई का स्नेह भरा रिश्ता बहन को फीका लगने लगा है। उसे लगता है लखपति भाई के यहाँ खाना नहीं खाएँगे तो शायद उन्हें बुरा लग जाएगा लेकिन रिश्ते तो एक से होते हैं फिर क्या लखपति और क्या गरीब, दिल तो एक-सा ही होता है चाहे वह पैसे वाले को हो या गरीब का। उसमें फर्क करने जैसी कोई बात नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि इस दुनिया सबसे लंबे समय तक जो निरंतर चलता रहता है वह रिश्ता है। पैसा तो आज है कल नहीं है।
वैसे भी लक्ष्मी कभी एक जगह टिककर रहती कहाँ है। लेकिन रिश्ते वह होते है जो आपको जोड़े रखने के अलावा एक अंदरूनी संतुष्टि भी देते है। जिससे आम आदमी उन रिश्तों के बलबूते पर जीवन की हर जंग बड़ी आसानी से लड़ लेता है। काश ! दुनिया के इन अमीरों-गरीबों का फासला दूर हो जाए। और रिश्ते सही मायने में रिश्ते ही रहे तो फिर इस दिल की दुनिया वालों के उन रिश्तों के क्या कहने।
वास्तव में जिस दिन ऐसा कुछ होगा उस दिन इस दुनिया का रूप ही अलग-सा नजर आने लगेगा। और तभी सभी के दिलों को सुकून महसूस होगा कि रिश्ते की यह मजबूत डोर कभी किसी अमीर और गरीब के दिलों को पाट ना सकेंगी।
रिश्तों की महक को सिक्कों के खनक के साथ मिलाने की कोशिश ना की जाय तो अच्छा हैं वरना एक दिन ऐसा आयेगा जब आपके पास पैसे और सिक्कों के ढेर के आलावा कुछ शेष ना रहेगा और हम तन्हा जीवन बिताने के लिये विवश हो जायेंगें और हमारी तन्हाई दुर करने के लिये हमारे साथ कोई ना होगा ।
धन्यवाद ।
