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हैलो दोस्तों,
बहुत दिनों के बाद एक बार फिर से आपकी सेवा में फिर से हाजिर हूँ अपने विचारों के साथ आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमेशा की तरह आपकों मेरे विचार जरुर पसंद आयेंगें ।
अभी कुछ दिनों पहले मुझे वाराणसी जाने का अवसर मिला और मिला क्या कहिये अवसर निकाला । क्योंकि आज के व्यस्त जीवन शैली में कहाँ किसी को मौका है फुरसत के लम्हें जीने के । पर मैं ये अवसर खोना नहीं चाहता था । वैसे साल 2014 के प्रथम दिन ही मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ पार्टी के बारे में सोच रहा था पर कुछ कारणों से ऐसा हो ना सका और वाराणसी जाने और मुवी देखने की मेरी ख्वाहिश पुरी ना हो सकी । फिर मैने सोचा चलो कोई बात नहीं आज नहीं तो फिर कभी । और फिर कभी बहुत दुर नहीं बस पास में ही था और मुझे वाराणसी जाने तथा मुवी देखने का मौका मिला । हाँ ये अलग बात है कि मेरे साथ मेरे दोस्त नहीं थे फिर भी मैंनें मुवी को खुब enjoy किया । और मुवी थी -" शोले 3D "
वाराणसी के JHV MALL के धमाकेदार dolby sound के बीच शोले 3D में देखने का एक अलग ही मजा था ।ये मुवी मैंने ओरिजनल वर्जन में आज से लगभग दस साल पहले देखी थी , पर आज फिर से एक बार देखने पर ऐसा नहीं लगा कि मैं लगभग 40 साल पुरानी फिल्म देख रहा हूँ ।ऐसे ही नहीं इस क्लासिक फिल्म को सदाबहार फिल्म का दर्जा प्राप्त है ।
पहले बात करते हैं ओरिजनल वर्जन की । शोले 1975 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है । इसका नाम हिन्दुस्तान की सार्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार है तथा इसने कई आगामी फिल्मों के लिए एक प्रेरणास्रोत का काम किया ।शोले फ़िल्म 15 अगस्त, 1975 को रिलीज़ हुयी। शुरु के दो सप्ताह ये कुछ खास नही चली, पर तीसरे सप्ताह से ये रातो रात सन्सनी बन गयी। अंततः यह फ़िल्म 1975 की सर्वाधिक कमाई करने वाली फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म ने भारत मे लगातार मे लगातार 50 सप्ताह तक प्रदर्शन का कीर्तीमान भी बनाया। साथ ही यह फ़िल्म भारतीय फ़िल्मो के इतिहास मे ऐसी पहली फ़िल्म बनी, जिसने सौ से भी ज्यादा सिनेमा घरो मे रजत जयंती (25 सप्ताह) मनाई। मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर मे इसे लगातार 5 वर्षों तक प्रदर्शित किया गया।
अपने प्रथम के दौरान इसने 15 करोड रुपयों की कमाई की, जो कि इसकी 2 करोड की लागत से कई गुना था। अनुमान के मुताबिक, मंहगाई दर के आधार पर समायोजित करने पर यह फ़िल्म, भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास मे सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है।
डायरेक्टर केतन मेहता को पिछले साल शोले के डायरेक्टर रमेश सिप्पी के ग्रैंडसन साशा सिप्पी ने करीब साढे तीन घंटे लंबी इस पूरी फिल्म को 3डी तकनीक में बदलने के लिए अप्रोच किया। उस वक्त केतन ने साशा को समझाया बॉलिवुड की अब तक 3डी में बनी फिल्में दो से ढाई घंटे अवधि के बीच रही है, ऐसे में 207 मिनट की शोले को टोटली 3डी में तब्दील करना आसान टास्क नहीं होगा। खैर जब केतन को लगा साशा अपना फैसला नहीं बदलने वाले तब उन्होंने अपने माया स्टूडियो में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। पर्दे पर सिर्फ एक सेकंड में नजर आने वाले 3डी सीन के लिए 24 फ्रेम बनाए जाते है, यानी 207 मिनट की शोले को 3डी करने के लिए 2.80 लाख फ्रेम बनाए गए।
करीब चार दशक पहले बॉक्स ऑफिस पर कमाई और कामयाबी का इतिहास रच चुकी शोले 3-डी में दर्शकों के सामने पहुंची है। दिल्ली, यूपी सहित देश भर के लगभग सभी मेजर सेंटरों पर शुक्रवार को फिल्म प्रदर्शित की गई। शोले 3डी ने पहले दिन टिकट खिड़की पर पचास से साठ फीसदी का बिजनेस करके उन आलोचकों को करारा जवाब दिया जो चालीस साल बाद दोबारा आ रही शोले 3डी को प्रॉडक्शन कंपनी के लिए घाटे का सौदा बता रहे थे।
कहानी-
रामगढ के ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) एक इंसपेक्टर है जिसने, एक डाकू सरगना गब्बर सिंह (अमज़द ख़ान) को पकड़कर जेल में डलवा दिया। पर गब्बर जेल से भाग निकलता है और ठाकुर के परिवार को बर्बाद कर देता है । इसका बदला लेने के लिए ठाकुर दो चोरों की मदद लेता है - जय (अमिताभ बच्चन) तथा वीरू (धर्मेन्द्र) ।
गब्बर के तीन साथी रामगढ के ग्रामीणों से अनाज लेने आते हैं, पर जय और वीरु की वजह से उन्हे खाली हाथ जाना पडता है। गब्बर उनके मात्र दो लोगो से हारने पर बहुत क्रोधित होता है और उन तीनो को मार डालता है। गब्बर होली के दिन गाँव पर हमला करता है और काफ़ी लडाई के बाद जय और वीरु को बंधक बना लेता है। ठाकुर उन्की मदद करने कि स्थीति मे होने पर भी उनकी मदद नही करता। किसी तरह जय और वीरु बच जाते है। तब ठाकुर उन्हे बताता है कि किस तरह कुछ समय पहले, उसने गब्बर को गिरफ्तार किया था पर वो जेल से भाग गया और ठाकुर के पूरे परिवार को मार डाला। बाद मे उसने ठाकुर को पकड कर उसके दोनो हाथ काट दिये।
रामगढ मे रहते हुये जय को ठाकुर की विधवा बहू राधा (जया बच्चन) और वीरु को बसन्ती (हेमा मालिनी) से प्यार हो जाता है।
बसन्ती और वीरु को गब्बर के आदमी पकड कर ले जाते है और जय उनको बचाने जाता है। लडाई मे जय को गोली लग जाती है। वीरु गब्बर के पीछे जाता है और उसे पकड लेता है।
मुख्य कलाकार-
धर्मेन्द्र - वीरू
संजीव कुमार - ठाकुर बलदेव सिंह (ठाकुर साहब)
हेमा मालिनी - बसंती
अमिताभ बच्चन - जय (जयदेव)
जाया भादुरी - राधा
अमज़द ख़ान - गब्बर सिंह
ए के हंगल - इमाम साहब/रहीम चाचा
सचिन - अहमद
सत्येन्द्र कपूर - रामलाल
इफ़्तेख़ार - नर्मलाजी, राधा के पिता
लीला मिश्रा - मौसी
विकास आनंद - जय और वीरू को लाने नियुक्त जेलर
पी जयराज - पुलिस कमिश्नर
असरानी - जेलर
राज किशोर - कैदी
मैक मोहन - साँभा
विजू खोटे - कालिया
कैस्टो मुखर्जी - हरिराम
हबीब - हीरा
शरद कुमार - निन्नी
मास्टर अलंकार - दीपक
गीता सिद्धार्थ - दीपक की माँ (अतिथि पात्र)
ओम शिवपुरी - इंस्पेक्टर साहब (अतिथि पात्र)
जगदीप - सूरमा भोपाली (अतिथि पात्र)
हेलन - बंजारा नर्तकी (अतिथि पात्र, 'महबूबा महबूबा' गाने में)
जलाल आग़ा -बंजारा गायक (अतिथि पात्र, 'महबूबा महबूबा' गाने में)
निर्देशक:-रमेश सिप्पी
लेखक:-जावेद अख्तर, सलीम ख़ान
निर्माता:- जी पी सिप्पी
छायांकन:- द्वारका दिवेचा
संपादक:- एम् एस शिंदे
कला निर्देशक:- राम येडेकर
स्टंट:- मोहम्मद अली, जेरी क्रांपटन
नृत्य निर्देशक:- पी एल राज
संगीतकार:- राहुल देव बर्मन
गीतकार:- आनंद बख्शी
पार्श्वगायक:- राहुल देव बर्मन, मन्ना डे, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, भूपेंद्र सिंह
ये तो रही पुरानी बात जो मैंनें विकिपिडिया से लिया और ctrl+c तथा ctrl+v किया। पर अब आते हैं मेरे विचारों पर जो मैंनें मुवी देखते हुये अनुभव किया ।
सबसे पहले जब मैं मुवी देखने गया तो सिर्फ और सिर्फ दो चीजों पर ध्यान था, पहला 3D और दुसरा sound । इन दो चीजों में ये फिल्म पुरा खरा उतरता हैं और पैसा वसुल का मुहर लग जाता है ।
70 एमएम के विशाल स्क्रीन पर आंखों पर 3डी का रंगीन चश्मा पहने जब मैने रामगढ़ वालों के बीच गब्बर सिंह से खौफ के सीन देखा तो एकबारगी हतप्रभ रह गया । यूं तो इस यादगार फिल्म में बाइस से ज्यादा ऐसे सीन है जो 3डी में कहर ढाते है, लेकिन मैं आपको शोले के उन चंद बेहतरीन 3 डी सीन के बारे में बताता हूँ जिनका जवाब नहीं-
1. ठाकुर ( संजीव कुमार) द्वारा मालगाड़ी में वीरू-जय को लेकर जाने वाले सीन के बाद ट्रेन पर डकैती का सीन। करीब नौ मिनट लंबे इस सीन में 3डी इफेक्टस गजब ढाते है। डाकुओं की ओर से निकलती गोलियों के बीच ट्रेन की छत पर फिल्माएं फाइट सीन देखकर मैं तो एकदम हैरान रह गया ।
2. गब्बर सिंह ( अमजद खान) का एंट्री सीन जहां वह रामगढ से मार खाने के बाद लौटे अपने तीन साथियों को ठहाकों के बाद गोलियों से उड़ाता है। गब्बर की गोली के बाद कालिया और गब्बर गैंग के दो डाकुओं का हवा के बीच गिरने वाले सीन में ठहाकों वाले सीन का साउंड इफेक्ट और थ्री डी के चश्मे से गब्बर को हाथों में खैनी रगड़ने का सीन देखने लायक है। ठहाके की आवाज से पुरा थियेटर गुंजने लगता है ।
3. रामगढ़ में वीरू का पानी की टंकी पर चढकर बसंती से अपने प्यार का इजहार करने वाले सीन में दारू की बोतल लिए वह एकदम मेरे पास नजर आया ।
4. गब्बर के डाकू गैंग से बसंती का अपने तांगे में बचकर निकलना और तेज रफ्तार से भागते तांगे को खींच रही धन्नो ( घोड़ी) पर चाबुकों की बौछार के बीच तांगे का पहिया निकलने वाले सीन का 3डी इफेक्ट किसी से कम नहीं।
5. होली के दिन गब्बर का रामगढ़ पर अटैक, फाइट सीन के बीच गब्बर की आंखों में जय द्वारा रंग डालने वाले सीन देख मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी आंखों में रंग डाल दिया हो।
6. गब्बर के अडडे पर बसंती का 'जब तक है जान मैं नाचूंगी...' पर डांस करने के दौरान डाकुओं द्वारा दारू की बोतलें तोड़ना, कांच पर खून से लथपथ नंगे पांव पर बसंती का नाच। गजब का सीन....वाह ।
7. रामगढ़ में गब्बर का ठाकुर के पूरे परिवार को गोलियों से भूनने वाले सीन में ठाकुर की एंट्री के सीन में ठाकुर के गुस्से का सीन और सबके मर जाने के बाद बच्चा के आने और झुले का अपने आप झुलने और उसकी आवाज ....वाह ।
8. लकडी के पुल पर बम के फटने का सीन का क्या कहना। ऐसा धमाका की मेरा दिल धक से रह गया, और कुछ देर तक मेरी आंखों के सामने शोले और लकडी के टुकडे गिरते हुए नजर आते रहें ।
इन सीन्स के अलावा वीरू का बसंती को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग वाला सीन ,फिल्म के क्लाइमेक्स में वीरू और जय का गब्बर के गैंग से भिड़ना जैसे कई ऐसे सीन है जो थ्रीडी तकनीक में देखने लायक हैं।
मुझे इस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी लगी । खास कर जय और राधा की खामोश प्रेम कथा । जो आज के तडक - भडक और सेक्स सीन से दुर एकदम शांत , सौम्य और दिल को छु लेने वाला है । जिसमें उन दोनो के बीच नाम मात्र का संवाद है। यहाँ तक की अपने प्यार का वो इजहार भी नहीं कर पाते , फिर भी एक सच्चा प्यार । ऐसा प्यार जो अपने परवान चढने से पहले ही खत्म हो गया । राधा जो विधावा है और उसके रंगहीन जीवन में जय का आना और उसके रंगहीन जीवन को रंगों से भरने से पहले ही खुद खत्म हो जाना । जय का मरना इस फिल्म का सबसे दुखद पहलु है जो हमें झकझोर कर रख देती है ।
लोग कहते हैं कि अच्छे के साथ हमेशा अच्छा होता है पर जय का हद से ज्यादा अच्छा होने के बावजुद भी उसके साथ बुरा होता है । और जाते जाते सबको रुला जाता है । जय की अच्छाई इस बात से झलकती है कि वो शुरु से लेकर अन्त तक सारे अच्छे फैसले लेता है, चाहे ठाकुर को गोली लगने पर अस्पताल पहुंचाने का फैसला, रामगढ जाने का फैसला या फिर अन्त में वीरु और बसन्ती के जान बचाने का फैसला , सब कुछ । पर लोगो को दिखाता है कि ये फैसला उसका नहीं नसीब का है, ऊपर वाले का है ...क्यों कि सारे फैसलों से पहले वो जो टास करता है उसका सिक्का ही खोटा है यानी कि दोनो तरफ से हेड ।इस फिल्म में वैसे तो सभी का अपना किरदार है पर जय ही इसका मुख्य नायक है । जो दोस्ती, प्यार और फर्ज सबका ध्यान रखता है ।
इस फिल्म की खाशियत इसके गाने भी हैं जो आज भी सुपरहिट हैं ।
फ़िल्म का संगीत राहुल देव बर्मन ने दिया था| इसमें एक गीत महबूबा मेहबूबा उन्होने ख़ुद गाया भी था जिसे हेलेन और जलाल आगा पर फ़िल्माया गया था| फ़िल्म के गीत आनन्द बक्शी ने लिखे थे।
गीत "महबूबा मेहबूबा" बिनाका गीत माला 1975 वार्षिक सूची पर 24वीं पायदान पर और 1976 वार्षिक सूची पर 5वीं पायदान पर रही|
गीत "कोई हसीना जब रूठ जाती है" बिनाका गीत माला की 1975 वार्षिक सूची पर 30वीं पायदान पर और 1976 वार्षिक सूची पर 20वीं पायदान पर रही|
गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" बिनाका गीत माला की 1976 वार्षिक सूची पर 9वीं पायदान पर रही|
"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" किशोर कुमार, मन्ना डे
"हाँ जबतक है जान" लता मंगेशकर
"कोई हसीना जब रूठ जाती है" किशोर कुमार, हेमा मालिनी
"होली के दिन दिल खिल जाते है" किशोर कुमार, लता मंगेशकर, सम्वेत स्वर
"महबूबा महबूबा" राहुल देव बर्मन
"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" (दुखद) किशोर कुमार
मजबूत कथा, खटकेबाज डायलॉग, जीते-जागते साहसी दृश्य, चंबल के डाकुओं का चित्रण, गब्बर बने अमजद द्वारा संवादों की दमदार अदायगी, ठाकुर बने संजीवकुमार का जबर्दस्त अभिनय और उसे मिला अमिताभ और धर्मेंद्र का अचूक साथ। जया बच्चन और हेमा मालिनी के परस्पर विरोधी किरदारों का लाजवाब अभिनय कहानी के माफिक उम्दा संगीत और आरडी बर्मन के गीतों में और कहीं नजाकत भरे दृश्यों में माउथऑर्गन का लाजवाब इस्तेमाल उस पर हेलन का "मेहबूबा मेहबूबा" ऐसी तमाम खासियतें रहीं।
मुख्य किरदारों के साथ "साँबा", "कालिया" इन डाकुओं के किरदारों में मॅकमोहन और विजू खोटे की भी अलहदा पहचान कायम हुई। वहीं छोटे अहमद (सचिन) की डाकुओं द्वारा हत्या के करुण दृश्य में इमाम (एके हंगल) का भावपूर्ण अभिनय और पार्श्व में नमाज की अजान के सुर गमगीन माहौल की पेशकश का चरम बिंदु रहे।
बसंती को शादी के लिए राजी करते वीरू का "सुसाइड नोट", जय के जेब में दो अलहदा सिक्के, राधा की नजाकत भरी खामोशी, वहीं ठाकुर के हाथ काटने का दर्दनाक दृश्य, जेलर असरानी, केश्टो मुखर्जी और जगदीप के व्यंग्य ऐसे तमाम अलहदा रंगों से सजे "शोले" ने मेरा दिल जीत लिया ।
डायलाग :-
केवल शहर ही नहीं दूर दराज कस्बों में भी लोग इसके डायलॉग का मजा लेते थे। "कितने आदमी थे?" गब्बर यानी अमजद खान का यह डायलॉग इतना लोकप्रिय है कि आज भी मिमिक्री शोज में यह डायलॉग अलग-अलग कलाकार किस लहजे, अंदाज में बोलेंगे का प्रयोग आज भी तालियाँ हासिल करता है। इतना ही नहीं इस डायलॉग पर ही कई अलहदा तरह के व्यंग्यों की भी पेशकश होने लगी है।
कितने आदमी थे?
वो दो थे, और तुम तीन । फिर भी खाली हाथ लौट आये।
कितना इनाम रखे है, सरकार हम पर।
यहाँ से पचास पचास गाँवो में, जब बच्चा नहीं सोता हैं, तो माँ कहती हैं - सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जायेगा।
बहुत नाइंसाफी हैं।
अब तेरा क्या होगा कालिया?
ये हाथ नहीं फाँसी का फंदा हैं।
ये हाथ हमको दे दे , ठाकुर।
तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफी हैं।
तेरा नाम क्या है, बसंती?
बसंती, इन कुत्तो के सामने मत नाचना।
आधे दाये जाओ, आधे बाये , बाकी मेरे पीछे आओ।
हम अंग्र्जों के जमाने के जेलर हैं।
इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
सबसे हिट डायलोग :-
जो डर गया समझो मर गया !
केवल शहर ही नहीं दूर दराज कस्बों में भी लोग इसके डायलॉग का मजा लेते थे। "कितने आदमी थे?" गब्बर यानी अमजद खान का यह डायलॉग इतना लोकप्रिय है कि आज भी मिमिक्री शोज में यह डायलॉग अलग-अलग कलाकार किस लहजे, अंदाज में बोलेंगे का प्रयोग आज भी तालियाँ हासिल करता है। इतना ही नहीं इस डायलॉग पर ही कई अलहदा तरह के व्यंग्यों की भी पेशकश होने लगी है।
कितने आदमी थे?
वो दो थे, और तुम तीन । फिर भी खाली हाथ लौट आये।
कितना इनाम रखे है, सरकार हम पर।
यहाँ से पचास पचास गाँवो में, जब बच्चा नहीं सोता हैं, तो माँ कहती हैं - सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जायेगा।
बहुत नाइंसाफी हैं।
अब तेरा क्या होगा कालिया?
ये हाथ नहीं फाँसी का फंदा हैं।
ये हाथ हमको दे दे , ठाकुर।
तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफी हैं।
तेरा नाम क्या है, बसंती?
बसंती, इन कुत्तो के सामने मत नाचना।
आधे दाये जाओ, आधे बाये , बाकी मेरे पीछे आओ।
हम अंग्र्जों के जमाने के जेलर हैं।
इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
सबसे हिट डायलोग :-
जो डर गया समझो मर गया !
अभी तो बहुत कुछ रह गया बताने को ....फिर भी यदि आपने अभी तक ये मुवी नही देखी तो एकबार जरुर देखिये....।


