Monday, May 19, 2014

THE MAKING OF NAMO BRAND

नमस्ते दोस्तों,

                             आज की चर्चा ना चुनाव और ना ही उम्मिदवार के बारे में है , आज की चर्चा हमारे देश के नये प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में है। आम चुनावों में मोदी को मिली जबरदस्त सफलता ने मैनेजमेंट पढ़ा रहे कॉलेजों का ध्यान खींचा है। विवि के इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) ने मोदी के चुनावी अभियान को ब्रांडिंग और मार्केटिंग का बड़ा उदाहरण मानकर केस स्टडी शुरू करने की घोषणा की है। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) ने भी इसे अध्ययन का विषय माना है। आईएमएस के प्लेसमेंट ऑफिसर, शिक्षकों और छात्रों के दल ने 'द मेकिंग ऑफ ब्रांड नमो' शीर्षक से केस स्टडी पर काम शुरू कर दिया है। प्लेसमेंट ऑफिसर निशिकांत वाइकर, अवनीश व्यास और शिक्षक दिव्या पुरोहित के साथ चार विद्यार्थियों की टीम ने मैनेजमेंट की नजर से मोदी के चुनावी अभियान का विश्लेषण शुरू कर दिया है।



                            आईएमएस के शिक्षकों के अनुसार देश के इतिहास में मोदी का चुनावी अभियान अब तक का सबसे बड़ा पॉलिटिकल ब्रांडिंग और मार्केटिंग कैंपेन था। किसी ब्रांड को कैसे आम लोगों के बीच स्थापित किया जाए, यह इससे सीखा जा सकता है। डेढ़ साल पहले से मोदी की गतिविधियों को मैनेजमेंट के अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। डॉ.वाइकर के अनुसार भाजपा में गडकरी के अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही मोदी को ब्रांड बनाने का अभियान शुरू हुआ था। मोदी ने अमिताभ और पीयूष पांडे जैसे ब्रांड मेकर्स के साथ वाइब्रेंट गुजरात का नारा गढ़ा और खुद को भाजपा में ब्रांड बनाने की शुरुआत की। गुजरात मॉडल को पार्टी के भीतर उपलब्धि के तौर पर पेश कर खुद को नेशनल लीडर के रूप में स्वीकार करवाया। केस स्टडी में कैंपेन की प्रारंभिक रणनीति इसे ही माना जा सकता है।

                            स्टडी तैयार कर रहे आईएमएस के जसरीन कौर, चंदन अरोरा, अभिनव चौरसिया और अंकित श्रीवास्तव के अनुसार ब्रांडिंग की सही रणनीति के दम पर मोदी ने पहले पार्टी में खुद को राष्ट्रीय नेता स्वीकार करवाया। इसके बाद अहमदाबाद में 170 लोगों की टीम मोदी की ब्रांडिंग में लगी रही। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान मोदी ने खुद की तमाम खासियतें लोगों तक पहुंचाई। इसके लिए मिक्स मीडिया का उपयोग किया गया। इसमें सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सीधे सवांद करना भी शामिल था। यह अच्छा उदाहरण है कि किसी ब्रांड को स्थापित करने के लिए लोगों तक पहुंचा कैसे जा सकता है।

                          ''अब की बार मोदी सरकार" नारे को मनोवैज्ञानिक असर पैदा करने वाला मानकर मार्केटिंग के हिसाब से मुफीद माना जा रहा है। मैनेजमेंट के शिक्षकों के अनुसार 1996 में भाजपा ने नारा दिया था 'सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी’, उस वर्ष भी भाजपा को सत्ता मिली थी। नारे में किसी नाम का शुमार होना लोगों को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रभावित करता है। नारे गढ़ने की इस कला से किसी उत्पाद के लिए अच्छी टैग लाइन बनाना सीख सकते हैं।

                        आईआईएम इंदौर के मीडिया ऑफिसर डॉ.अख्तर परवेज के अनुसार मोदी का प्रचार अभियान सबसे लंबा चला। कपड़ों से लेकर सीने पर लगे कमल और ट्वीट तक को कस्टमर यानी मतदाताओं के लिहाज से तैयार करवाया गया। विविधताओं वाले देश में अभियान सफल रहा लिहाजा मीडिया का ब्रांड बिल्डिंग में कैसे सही उपयोग किया जाए, ये सारी बातें इस चुनावी अभियान से सीखी जा सकती हैं। आईआईएम के छात्र भी निश्चित रूप से इस पर स्टडी करेंगे।