Friday, December 28, 2012

बचपन

Hello Friends,
                     मेरे पिछले पोस्ट जो कि 10th Oct, 2012 को आया था , उसके बाद वक्त ही नहीं मिला कुछ लिखने के लिये....पर आज फिर से मैं आप लोगों की सेवा में हाजिर हूँ अपने नये पोस्ट के साथ, जिसमें पिछले कुछ दिनों से मेरे दिलों-दिमाग में चल रही सारी बातों को आपके सामने लाने की कोशिश करुंगा और आशा करता हूँ आप उसे उतने ही प्यार और स्नेह से पढेंगें जैसे अब तक पढते आये हैं ।

चूँकि साल का अंतिम महिना, अंतिम सप्ताह और सप्ताह का हर दिन आखिरी है जैसे कि आज गुरुवार है तो अगला गुरुवार अगले साल में आयेगा , तो मैं चाहता हूँ इस साल की कुछ खट्टी-मीठी यादों को सजोंया जाय ।

पिछले पोस्ट के बाद त्योहारों का मौसम शुरु हुआ और त्योहारों की तैयारी , भाग-दौड में दिन कैसे गुजर गया कुछ पता ही नहीं चला । दुर्गापूजा, दशहरा, दिवाली, छ्ठपूजा आदि बडे त्योहारों के साथ- साथ छोटे छोटे त्योहारों जैसे गोवर्धन पूजा, चित्रगुप्त पूजा , करवा चौथ, गणेश चतुर्थी आदि ना जाने कितने त्योहार आयें और अपने साथ ना जाने कितने खुशियाँ लायें । और इन त्योहारों ने अपने साथ साथ कुछ पुरानी यादों को भी ले आयें । जैसे बचपन में हम लोगों के लिये यदि सबसे बडा मुश्किल कोई काम था तो वह था स्कूल जाना । स्कूल             जाते वक्त तो मेरी हालत तो बिल्कुल वैसी होती थी जैसे किसी को फाँसी देने के लिये ले जाया जा रहा हो ।आज हम भले ही अपने स्कूल लाईफ को मिस करते हो क्योंकि अब वो लाईफ लौट कर आने वाला नहीं हैं उसे हम सिर्फ और सिर्फ यादों में ही संजों सकते हैं , स्कूल की मस्ती, दोस्तों के साथ खेलना-कुदना, झगडना, लडकियों के बारे में गॉशिप करना आदि बहुत याद आते हैं वो पल.....। फिर भी इन सभी मस्ती भरे पल होने के बावजुद कुछ ऐसी बाते भी थी जो हमें स्कूल से डराती थी जैसे किसी शिक्षक या किसी विषय से डर ....।

मेरी स्कूल लाईफ मेरे स्कूल चिल्ड्रेन एकाडमी और हाई स्कूल , कर्णपूरा में बिती हैं जिनसे मेरी बहुत सारी यादें जुडी हुई हैं । मेरे स्कूल चिल्ड्रेन एकाडमी में मुझे और मेरे दोस्तों को एक शिक्षक से बहुत डर लगता था । वो विज्ञान विषय के शिक्षक थे । पर उनसे हमें इतना डर लगता था कि हम उनके सामने जाने से भी कतराते थें । ऐसी ही कुछ बातों से कभी कभी हमें स्कूल से ज्यादा छुट्टियाँ अच्छी लगती थी और जब त्योहार आते थे तो फिर पुछना क्या ? और उसमें भी  दुर्गापूजा और दशहरा का त्योहार की तो बात ही कुछ और थी । क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा छुट्टियाँ होती थी । इस त्योहार के आते ही दिल बाग बाग हो जाता था । नये कपडे , खिलौने और घुमने के लिये ढेर सारा समय...। ना कोई चिन्ता ना कोई फिक्र....एकदम बिन्दास । दुर्गापूजा में हम दुर्गापूजा पण्डाल घुमने जाते थे और पण्डाल के साथ मुर्तियों के भी दर्शन करते थें । वैसे दुर्गापूजा में माँ दुर्गा की पूजा होती है और माँ की आराधना और अर्चना की जाती है दर्शन तथा पूजन किया जाता है पर हमलोगों का सारा ध्यान राक्षश महिषासुर के मुर्ति पर ही टिकी होती थी , हमारे लिये वो ही मुख्य आकर्षण का केन्द्र होता था । हम अपने दोस्तों से उसके शरीर की बनावट, कपडे , आभुषण तथा उसके वाहन भैंस की ही चर्चा करते थे । दुर्गापूजा में रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे लोकगीत, सिनेमा, आरकेस्ट्रा आदि देखने जाना और रात भर मस्ती करना ।इसके बाद दिवाली की मस्ती , पटाखे और ढेर सारी रोशनी.....। दिवाली पर दीये जलाना और पटाखे जलाने का अपना एक अलग मजा है । और उसके बाद छठ पूजा ।
छठ पूजा की तो बात ही निराली है । घाट पर जाना , दोस्तो से मिलना, मस्ती करना, गुब्बारे खरीदना और एक दुसरे के कपडो के बारे मे बाते करना कि किसका ज्यादा अच्छा है आदि । उन सब बातों को सोचकर ये दिल फिर से उन पलों को जीना चाहता है उन्हें महसुस करना चाहता है ।
बहुत रात हो गई है अब सोना चाहिये पर बात अभी पुरी नहीं हुई है.....बाकी बाते कल...
तब तक के लिये शुभ रात्रि...