"कभी कभी हम अपनी जिन्दगी से ऊब जाते हैं और जिन्दगी जिना एक मुश्किल भरा काम लगने लगता है, एक अनचाहा बोझ जो हम अपने सिर पर बिना किसी वजह के एक जगह से दुसरे जगह ढोते रहते हैं, और कभी कभी तो हम इस बोझ को ढोते ढोते इतने थक जाते हैं कि लगता है कि इस मायुसी भरी जिन्दगी में अब कुछ ना रहा, अब इसे खत्म कर देने में ही भलाई है।"
ऊपर की ये पंक्तियाँ पढ रहे कुछ लोगो को तो बहुत अच्छा लग रहा होगा और कुछ लोगों को ये कोरी बकवास लग रही होगी ।आप अपने आप को किस प्रकार के लोगों में रखते हैं , पहले वाले या दुसरे वाले ? खैर मैं आप लोगों के बारे में तो कुछ नहीं कह सकता पर मैं अपने बारे में तो कह ही सकता हूँ ।
मुझे ऊपर की ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी और मैं अपने आपको पहले वाले लोगों की श्रेणी में रखता हूँ । अब आपको मेरे ऊपर गुस्सा आ रहा होगा ...पर इसमे गुस्सा होने वाली कोई बात नहीं । सभी लोगों को अपनी पसंद-नापसंद करने की पुरी आजादी है , आखिर हम आजाद भारत के वासी हैं ।
अब मैं आपको बता दूँ कि मुझे ऐसा क्यों लगा तो बात ये है कि कभी- कभी हम अपने आपको लोगों की खुशियों के लिये पुरी तरह अर्पण कर देते हैं और अपने बारे में कुछ ना सोचते । चाहे उन लोगों में हमारा परिवार हो या हमारे friends । मुझे भी कभी- कभी ऐसा लगता है कि मैं भी almost ऐसा ही हूँ । पर लोगों के बारे में सोचते सोचते हम इतने थक जाते हैं कि अपने बारे में सोच ही नहीं सकते । और दुख तो तब होता है जब वही लोग हमारे बारे में , जो उनके लिये इतना कुछ करते रहते हैं, कुछ नहीं सोचते ।
लोगों का ऐसा स्वार्थ देख कर इस दिल को बहुत ठेस लगती है और जिन्दगी भर दिल में एक टिस सी रह जाती हैं और दर्द को छुपाये छुपाये जब दिल भर आता है तो फिर वही ऊपर वाली पंक्तियाँ याद आती है ।
पर फिर कुछ सोचकर ये दिल रुक जाता है कि ये हम क्या सोच रहें है ? क्या जिन्दगी यही है ? नहीं ये जिन्दगी नहीं है, जिन्दगी जिने का नाम है और इसी ख्याल से हम जिये जा रहे हैं ।
पर मन में एक विश्वास है कि मेरे साथ भी कभी कुछ अच्छा होगा ।
जला जला कर खुद को,खाक करते हो क्यूं।
ज़िन्दगी अनमोल खजाना,जीना तो सीख लो।
देख कर औरों की खुशियां कुढ़ते हो क्यूं
गैरों की खुशी में भी,हंसना तो सीख लो।
रास्ते मंजिलों के,आसान ढूंढ़ते हो क्यूं
मुश्किलों का सामना,करना तो सीख लो।
छूने को आसमान की हद,कोशिश करो जरूर
पहले पांव को जमीं पर,जमाना तो सीख लो।
अपने को गैरों से,ऊंचा समझते हो क्यूं
एक बार खुद को भी कभी,आंकना तो सीख लो।
तक़दीर को ही हर कदम पर,कोसते हो क्यूं
रह गई कमी कहां पे है,जानना तो सीख लो।
कर के भरोसा दूसरों पे,पछताते हो क्यूं
बस हौसला बुलंद करना,खुद का तो सीख लो।
बात सिर्फ़ इतनी सी है,जीवन फ़कत पाना ही क्यूं,
खोना भी पड़ता है बहुत,सब्र करना तो सीख लो।






