Wednesday, October 20, 2010

ये चेहरा किसका चेहरा है ?


सुबह- सुबह कितनी चीजें हैं ,जो हमारे मूड को अच्छा बनाने के लिये होती हैं , खुला आसमान ,ताजी हवा, मंदिर की घण्टी की आवाज, नदी की कल कल, पत्तों का धिमे धिमे हिलना ...।लेकिन कभी हमने ये गौर किया है कि जब हम बच्चों से बात करते हैं या उनके साथ समय बिताते हैं तो कितना बेहतर महसुस करते हैं ...क्यों होता है ऐसा ?
जवाब बहुत सिंपल है बच्चों के सामने हमें नकली चेहरा बनाकर नहीं जाना पडता है, इसलिये भी कि हम जानते हैं कि हमारी किसी भी बात का वो बुरा नहीं मानते हैं। हो सकता है कि वो कुछ देर के लिये रूठ जाये पर उसे मनाना भी उतना ही आसान होता है बस उसके सामने उसकी पसंद की चीज रख दो जैसे- चॉकलेट, कॉमिक्स, आइसक्रिम आदि। बच्चों की यही सरलता हमें अच्छा महसुस कराती है क्योंकि हम सब अपने नकाब के साथ कम्फर्टेबल नहीं होते, हम जानते हैं कि ये हमारा असली चेहरा नही हैं और यह झुठ ही हमारा बोझ होता है ,जिसे हम लाईफ टाईम कैरी करते हैं ।
एक बात बताइये हम हैवी महसुस नहीं करते ? लोगो का जवाब होता है क्या करुँ लोग बडा हर्ट करते हैं और मैं नहीं चाहता हूँ कि मुझे कोई बार बार हर्ट करें । मैं थक गया हूँ अब बर्दाश्त नहीं होता ।
लेकिन मैने सोचा कौन सा बोझ सबसे बडा है लोगो की दी हुई चोट या अपने चेहरे पर नकाब ओढने का यानी हर वक्त एक्टींग करने का ................?
इसका जवाब आप अपने कमेन्ट्स देकर दीजिये........।

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