

समय की कमी के कारण आप लोगों से कुछ दिनों के बाद मिलना हो रहा हैं...
क्या आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं ?
सफलता और संतुष्टि के बीच का संबंध क्या है ?
क्या संतुष्टि और सुख एक दूसरे के पूरक हैं ?
सुखिया ये संसार है खावे अरू सोये, दुखिया दास कबीर है जागे अरू रोये।
ऐसे कितने ही सवाल हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं और हम अक्सर उन्हें टालकर अथवा बिना विचारे कोई दार्शनिक तर्क देकर आगे बढ जाते हैं। लेकिन उसके बाद भी ये प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते हैं। मेरी समझ में सुख और संतुष्टि दोनो ही आपके "मन", "विचार" और "कर्मों" के आपसी संतुलन और साम्य पर निर्भर करती है। कम से कम मेरे जीवन में ये साम्य और संतुलन अभी स्थापित नहीं हो सका है; इस दिशा में प्रयासरत अवश्य हूँ देखिए कब मेहनत रंग लाती है।
कथनी और करनी का अंतर, विचार और आचार की भिन्नता, स्वयं के व्यवहार पर खिन्नता और मन के अन्दर सदैव चलने वाला अंतर्कलह सब एक ही तो हैं। बात बड़ी सरल सी लगती है और सरल बात इतनी आसानी से समझ नहीं आती।
इस छोटे से जीवन में मुझे कुछ विलक्षण प्रतिभा के धनी महापुरुषों के साथ कुछ समय बिताने का सुअवसर मिला और उन सभी के व्यक्तित्व में मुझे एक बात समान लगी, उन सब के आचरण और व्यवहार में मुझे एक अजीब सी सहजता दिखी। बहुत से लोग अपने व्यक्तित्व में इस सहजता को जबरन ठूँसने का प्रयास करते हैं। लेकिन ये प्रयास उसी प्रकार असफल हो जाते हैं जैसे कि युवाओं में "कूल" दिखने के प्रयास। किसी ने कहा है कि अगर आप "कूल" हैं तो आपको "कूल" दिखने के किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार व्यवहार और आचरण की सहजता अपने आप ही आती है। आप इस प्रकार के आचरण का झूठा लबादा देर तक नहीं ओढ़ सकते। आपके मन और चरित्र की दुर्बलातायें उस ओढे हुये लबादे तो तार तार करने में देर नहीं लगाती ।
अब प्रश्न ये उठता है कि क्या इस प्रकार की व्यवहार की सहजता को प्रयास से अर्जित किया जा सकता है ? क्या निरन्तर प्रयास के द्वारा आप सच जैसा दिखने वाला झूठा लबादा ओढ सकते हैं ? इस प्रकार के प्रयासो का आपके व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड सकता है ? दूसरों को जताना कि आप बडे सहज हैं आसान है; लेकिन स्वयं के मस्तिष्क को इतना ट्रेन करना कि आप झूठा लबादा सहजता से ओढे रहें अलग बात है । मेरी राय में ऐसे प्रयासों का सफल होना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं । इसके अलावा अगर आप इस प्रकार की झूठी सहजता को ओढने में सफ़ल हो भी जायें तो भी दोहरा जीवन जीने की विडम्बना के रूप में एक कीमत आपको देनी ही पडती है ।
जिस व्यक्ति से आपको घृणा होती है उसके व्यक्तित्व की कोई ऐसी बात होती है जो आप स्वयं में भी पाते हैं (दूसरे लोग ये जानते हों जरूरी नहीं है ), और यही बात आपको कभी कभी बहुत परेशान करती है ।
ज्यादा सोचने वाला विषय तो नहीं है लेकिन यदि आप इसपर विचार करें तो और भी अच्छा होगा ।
तब तक के लिए नमस्कार........
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