Tuesday, June 3, 2014

जिया खान और उसका दर्द

नमस्ते दोस्तों,
                    आज फिर से कुछ अनछुयें बातों के साथ आपका दोस्त आपकी सेवा में हाजिर है । कुछ दिनों पहलें मैंनें अपनें एक पोस्ट लव , सेक्स और धोखा में जिया खान के बारे में कुछ लिखा था । आगे कुछ भी पढने से पहले कृपया एक बार लव , सेक्स और धोखा को जरुर पढें । 

                   आज फिर से पुरे एक साल के बाद उस घटना के बारे में याद करते हुये कुछ बातों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ । आज जो मैं लिख रहा हूँ वो  मैंनें एक मैंनें कहीं और से पढी है । जिया खान का आखिरी खत । छह पन्नों में फैली दर्द की कहानी । इसमें सिर्फ बॉयफ्रेंड की वादाखिलाफी ही नहीं है। अबॉर्शन के मुश्किल फैसले से लेकर मारपीट के शिकार होने और उन सबसे भी पहले रेप किए जाने का भी बयान है। जिया अपने बॉयफ्रेंड को एड्रेस करते हुए लिखती हैं, कि पहले ही मेरे साथ बलात्कार और शोषण हो चुका है, क्या अब मैं कुछ बेहतर डिजर्व नहीं करती। यहाँ हम जिया के मकसद में जाने के बजाय आपको पढ़वा रहे हैं, उनका खत, आखिरी खत, हू ब हू.......


          "पता नहीं, तुमसे ये बात कैसे कहूँ । मगर अब खोने को कुछ भी नहीं बचा है। इसलिए सब कुछ बयां कर देने का यही सही वक्त है। वैसे भी मैं पहले ही सब कुछ खो चुकी हूं.।अगर तुम इसे पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं या तो जा चुकी हूं या इसकी तैयारी में हूँ ।अंदर से टूट चुकी हूँ  मैं । तुम्हें शायद इस बात का पता न हो, मगर तुम्हारा मुझ पर ऐसा असर था कि मैं टूटकर प्यार करने लगी. और उस फेर में खुद को पूरी तरह भुला दिया, खो दिया ।मगर तुम थे कि मुझे तड़पाते रहते थे, तकलीफ देते रहते थे, रोजाना।

                   अब मुझे अपनी जिंदगी में रौशनी की एक लकीर भी नहीं दिखती । सुबह आंख खुलती है, पर बिस्तर से उठने का मन नहीं करता । कभी ऐसे भी दिन थे, जब मैं बस अपना सब कुछ, अपना आने वाला कल तुम्हारे साथ में देखती थी । एक उम्मीद थी कि हम साथ होंगे । मगर तुमने मेरे उन सपनों को चूर चूर कर दिया। अब ऐसा लगता है कि जैसे अंदर से मर चुकी हूं मैं।
                
                 मैंने कभी किसी से इतना प्यार नहीं किया था, किसी की इतनी परवाह नहीं की थी । मगर मुझे बदले में क्या मिला।तुम्हारे झूठ, तुम्हारी बेवफाई । मैं तुम्हारे लिए गिफ्ट लाती रही, तुम्हारी नजरों में खूबसूरत दिखने के लिए जतन करती रही, मगर तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । प्रेग्नेंट होने का डर बना रहता था, फिर भी बिना हिचक तुम्हें सब कुछ सौंप दिया। मगर तुमने इन सबके बदले मुझे तकलीफ दी। इस दर्द ने मुझे पूरी तरह से मार दिया ।मेरी रूह तक तबाह हो गई।

                 अब हाल ये है कि न मैं खा पाती 
हूँ , न सो पाती हूँ , न सोच पाती हूँ और न ही कुछ कर पाती 
हूँ । हर चीज मेरी पकड़ से छूट रही है। करियर के बारे में तो अब सोचा भी नहीं जाता। जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी, मेरे भीतर उत्साह था, उम्मीदें थीं और अनुशासन था। फिर मुझे तुमसे प्यार हो गया। मुझे लगा कि अब मेरे भीतर की सबसे शानदार खूबियों को दुनिया में पनाह मिलेगी। मुझे नहीं पता क्यों तकदीर हमें साथ और करीब लेकर आई। पहले ही इतनी तकलीफों, बलात्कारों, गालियों और यातनाओं को सहने के बाद मैं कम-से-कम इन सबकी हकदार तो नहीं थी।

                   मुझे तुम्हारी नजरों में न तो प्यार नजर आया और न ही हमारे रिश्ते के लिए कोई कमिटमेंट. हर दिन मेरा यही डर बढ़ता रहा कि तुम मुझे मेंटली या फिजिकली हर्ट कर सकते हो. तुम्हारी जिंदगी बस औरतों और पार्टियों के इर्द गिर्द घूमती थी, जबकि मेरी जिंदगी मेरे काम और तुम्हारे बीच ही बसी थी. अगर मैं यहां रुकती हूं, तो तुम्हारी कमी खलेगी, तुम्हारी जरूरत महसूस होगी. इसलिए मैं अपने दस साल के करियर और उससे पनपे सपनों को अलविदा कहकर जा रही 
हूँ । 

                 मैंने तुम्हें कभी बताया नहीं लेकिन मुझे तुम्हारे बारे में एक मैसेज मिला था। इसमें मुझे बताया गया था कि कैसे तुम लगातार मुझे चीट कर रहे हो। मगर मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया। मैंने तुम पर भरोसा बनाए रखा। मगर तुमने मुझे शर्मिंदा किया। मैं कभी आउटिंग के लिए नहीं गई। कभी किसी और के साथ नहीं गई।  क्योंकि मैं वफादार इंसान हूं। मैं कार्तिक के साथ थी, ताकि तुम उस जलन को, उस शर्म को महसूस कर सको, जो तुम्हारी हरकतों की वजह से मुझे महसूस करनी पड़ी। मगर उस रिश्ते में भी मैंने दूरियों का ख्याल रखा। तुम्हें कोई और औरत इतना प्यार नहीं दे सकती, जितना मैंने दिया और ये बात मैं अपने खून से लिख सकती 
हूँ ।

                   मेरे लिए यहां चीजें बेहतर होती दिख रही थीं, मगर इन सबके कोई मायने नहीं रह जाते अगर आप दिल टूट जाने की वजह से लगातार तकलीफ में हैं । तकलीफ कि जिस शख्स से आप प्यार करते हैं, वो आपको गालियां बकता है, धमकी देता है, मारता है और चीट करता है, दूसरी लड़कियों के लिए।
तुम्हारे प्यार में पड़कर मैं तुम्हारे घर आती थी।  मगर तुम मूड बदलने पर मुझे बीच रात में धक्के देकर बाहर निकाल देते थे । मेरे मुंह पर दिन रात झूठ बोलते रहते थे । मेरे परिवार की बेइज्जती करते रहते थे।  मैं तुमसे मिलने के लिए तड़पती और दीवानों की तरह तुम्हारी कार का पीछा करती। तुम मेरी बहन से भी कभी नहीं मिले। जबकि मैं तुम्हारी बहन के लिए कितने गिफ्ट लेकर आई।

                तुमने मेरी आत्मा को नोच डाला है। अब मेरे पास सांस लेने की भी कोई वजह नहीं बची है। मैं सिर्फ और सिर्फ प्यार ही तो चाहती थी। उसके लिए, तुम्हारे लिए, मैंने सब कुछ किया। मैं काम करती थी, हम दोनों के बारे में सोचकर।मगर तुम तो कभी मेरे साथी, मेरे पार्टनर थे ही नहीं। अब मेरा भविष्य नष्ट हो चुका है, मेरी खुशी मुझसे छीनी जा चुकी है। मैंने हमेशा तुम्हारे लिए सबसे अच्छा चाहा है। जो भी थोड़ा बहुत पैसा मैंने बचाया था, उसे भी तुम्हारे लिए खर्चने को तैयार थी। मगर तुमने मेरे प्यार, मेरे केयर की कभी परवाह नहीं की। हमेशा मेरे मुंह पर तमाचा मारा। इसके चलते मेरे भीतर न तो आत्मविश्वास बचा है, न ही आत्म सम्मान। जो भी टेलेंट था, जो भी महात्वाकांक्षा थी, जब तुमने अपनी हरकतों से छीन ली।

            तुमने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी। इतना तकलीफ देता है ये सोचना कि मैंने दस दिनों तक तुम्हारा इंतजार किया और तुम्हें उस सफर से मेरे लिए एक तोहफा खरीदने की भी सुध नहीं रही। गोआ ट्रिप मेरा बर्थडे प्रेजेंट थी। तुमने मुझे धोखा दिया, फिर भी मैं तुम पर पैसे खर्च करती रही। मैंने अपना बेबी गिरवा दिया, अबॉर्शन करवा लिया और इसके दर्द में तड़पती रही। मैंने तुम्हारे बर्थडे को स्पेशल बनाने के लिए क्या कुछ नहीं किया, मगर तुमने मेरे वापस लौटने के बाद मेरे क्रिसमस और बर्थडे पार्टी दोनों को चौपट कर दिया।

            वैलंटाइंस डे के दिन भी तुम मुझसे दूर दूर रहे। तुमने वादा किया था कि जैसे ही हमारे अफेयर का एक साल पूरा हो जाएगा, तुम मेरे साथ मंगनी कर लोगे। लेकिन नहीं, जिंदगी में तुम्हें सिर्फ पार्टी और औरतें चाहिए, सिर्फ अपने लालची मकसदों को पूरा करने की ख्वाहिश है तुम्हारी।मैं जिंदगी में बस एक ही चीज चाहती थी और वो थे तुम। मगर तुमने तो मेरी हर खुशी छीन ली। मैंने बिना किसी स्वार्थ के तुम्हारे ऊपर पैसा खर्च किया। जब मैं तुम्हारे लिए रोई, तो तुम्हारे चेहरे पर शिकन भी नहीं थी। इन सबके बाद इस दुनिया में मेरे जीने की कोई वजह नहीं रह जाती।

            मैंने बस इतना चाहा था कि तुम मुझे वैसे ही प्यार करो, जैसे मैं तुमसे करती 
हूँ । मैंने हमारे भविष्य के सपने देखे थे, तुम्हारी कामयाबी के सपने देखे थे। मगर अब मैं इस जगह को छोड़ रही हूँ  और मेरे पास सिर्फ टूटे सपने और झूठे खाली वादे हैं। मैं अब सोना चाहती हूँ ऐसी नींद, जिससे कभी न जागना पड़े ।मेरे पास सब कुछ था, मगर अब कुछ भी नहीं है।तुम्हारे साथ थी, तभी अकेली हो चुकी थी। तुमने मुझे अकेला बना दिया। असुरक्षा से भर दिया। मैं ऐसी नहीं थी। बहुत कुछ था मेरे भीतर।"

कितना दर्द था उसके दिल में ये आप भी महसुस कर सकते हैं । क्या  उसके साथ जो हुआ ठीक हुआ या ......
Think about it.

Monday, May 19, 2014

THE MAKING OF NAMO BRAND

नमस्ते दोस्तों,

                             आज की चर्चा ना चुनाव और ना ही उम्मिदवार के बारे में है , आज की चर्चा हमारे देश के नये प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में है। आम चुनावों में मोदी को मिली जबरदस्त सफलता ने मैनेजमेंट पढ़ा रहे कॉलेजों का ध्यान खींचा है। विवि के इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) ने मोदी के चुनावी अभियान को ब्रांडिंग और मार्केटिंग का बड़ा उदाहरण मानकर केस स्टडी शुरू करने की घोषणा की है। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) ने भी इसे अध्ययन का विषय माना है। आईएमएस के प्लेसमेंट ऑफिसर, शिक्षकों और छात्रों के दल ने 'द मेकिंग ऑफ ब्रांड नमो' शीर्षक से केस स्टडी पर काम शुरू कर दिया है। प्लेसमेंट ऑफिसर निशिकांत वाइकर, अवनीश व्यास और शिक्षक दिव्या पुरोहित के साथ चार विद्यार्थियों की टीम ने मैनेजमेंट की नजर से मोदी के चुनावी अभियान का विश्लेषण शुरू कर दिया है।



                            आईएमएस के शिक्षकों के अनुसार देश के इतिहास में मोदी का चुनावी अभियान अब तक का सबसे बड़ा पॉलिटिकल ब्रांडिंग और मार्केटिंग कैंपेन था। किसी ब्रांड को कैसे आम लोगों के बीच स्थापित किया जाए, यह इससे सीखा जा सकता है। डेढ़ साल पहले से मोदी की गतिविधियों को मैनेजमेंट के अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। डॉ.वाइकर के अनुसार भाजपा में गडकरी के अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही मोदी को ब्रांड बनाने का अभियान शुरू हुआ था। मोदी ने अमिताभ और पीयूष पांडे जैसे ब्रांड मेकर्स के साथ वाइब्रेंट गुजरात का नारा गढ़ा और खुद को भाजपा में ब्रांड बनाने की शुरुआत की। गुजरात मॉडल को पार्टी के भीतर उपलब्धि के तौर पर पेश कर खुद को नेशनल लीडर के रूप में स्वीकार करवाया। केस स्टडी में कैंपेन की प्रारंभिक रणनीति इसे ही माना जा सकता है।

                            स्टडी तैयार कर रहे आईएमएस के जसरीन कौर, चंदन अरोरा, अभिनव चौरसिया और अंकित श्रीवास्तव के अनुसार ब्रांडिंग की सही रणनीति के दम पर मोदी ने पहले पार्टी में खुद को राष्ट्रीय नेता स्वीकार करवाया। इसके बाद अहमदाबाद में 170 लोगों की टीम मोदी की ब्रांडिंग में लगी रही। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान मोदी ने खुद की तमाम खासियतें लोगों तक पहुंचाई। इसके लिए मिक्स मीडिया का उपयोग किया गया। इसमें सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सीधे सवांद करना भी शामिल था। यह अच्छा उदाहरण है कि किसी ब्रांड को स्थापित करने के लिए लोगों तक पहुंचा कैसे जा सकता है।

                          ''अब की बार मोदी सरकार" नारे को मनोवैज्ञानिक असर पैदा करने वाला मानकर मार्केटिंग के हिसाब से मुफीद माना जा रहा है। मैनेजमेंट के शिक्षकों के अनुसार 1996 में भाजपा ने नारा दिया था 'सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी’, उस वर्ष भी भाजपा को सत्ता मिली थी। नारे में किसी नाम का शुमार होना लोगों को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रभावित करता है। नारे गढ़ने की इस कला से किसी उत्पाद के लिए अच्छी टैग लाइन बनाना सीख सकते हैं।

                        आईआईएम इंदौर के मीडिया ऑफिसर डॉ.अख्तर परवेज के अनुसार मोदी का प्रचार अभियान सबसे लंबा चला। कपड़ों से लेकर सीने पर लगे कमल और ट्वीट तक को कस्टमर यानी मतदाताओं के लिहाज से तैयार करवाया गया। विविधताओं वाले देश में अभियान सफल रहा लिहाजा मीडिया का ब्रांड बिल्डिंग में कैसे सही उपयोग किया जाए, ये सारी बातें इस चुनावी अभियान से सीखी जा सकती हैं। आईआईएम के छात्र भी निश्चित रूप से इस पर स्टडी करेंगे।

Friday, May 16, 2014

नरेन्द्र मोदी, भाजपा, संघ, मीडिया और कॉरपोरेट- नये प्रधानमंत्री

नमस्ते दोस्तों,
                   आज विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महापर्व का समापन उसके सुखद परिणाम के साथ हो गया और भारत को आगामी पाँच वर्ष के लिये एक मजबुत और स्थायी सरकार के रुप में मोदी सरकार मिल गया । इसे मोदी सरकार इसलिये कहा कि इस बार सरकार भारतीय जनता पार्टी की नहीं , मोदी की बनी है । और ये बात मैं ही नहीं पुरी दुनिया कह रही है क्योंकि "अबकी बार मोदी सरकार" ये पँचलाईन खुद मोदी सरकार ने ही शुरु से अंत तक अपने प्रचार के मुख्य हथियार के रुप में प्रयोग किया है । तो आईये आज अपने मोदी सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में कुछ बाते जानते हैं ।

           वर्षो पहले धीरूभाई अंबानी ने नरेंद्र मोदी को ‘लंबी रेस का घोड़ा’ कहा था । अप्रैल, 2009 में रॉबर्ट डी कप्लान ने ‘दि अटलांटिक’ में लिखा था कि मोदी जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन और दोनों बुशों को करिश्मा में पीछे छोड़ते हैं, उन्हें मात देते हैं। 1 मई, 1960 की अर्धरात्रि में गुजरात राज्य के जन्म के बाद, बचपन में ही मोदी संघ परिवार से जुड़े ।1971 से 1986 के 15 वर्षो में संघ में उनका क्रमश: विकास हुआ। 1974 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। ‘बाल स्वयंसेवक’ से आरंभ हुई उनकी यात्र-कथा अनोखी-अनूठी है। मोदी को लेकर दो धारणाएं हैं- आलोचनात्मक और प्रशंसात्मक। उनके बारे में तटस्थ नहीं रहा जा सकता या तो उनका समर्थक हुआ जा सकता है या विरोधी। विलियम अंथोलीस के लेख का शीर्षक है - ‘इंडियाज मोस्ट एडमायर्ड एंड मोस्ट फीयर्ड पॉलिटिशियन : नरेंद्र मोदी.’ ।

                         संघ प्रचारक बनने के बाद अस्सी के दशक में वे गुजरात में विभाग प्रचारक, संभाग प्रचारक और उसके बाद संघ व्यवस्था प्रमुख अर्थात् प्रांत पदाधिकारी बने ।1987 तक भाजपा से संघ की दूरी थी. 1987 के बाद संघ के जो पूर्णकालिक प्रचारक भाजपा से जुड़े, उनमें नरेंद्र मोदी प्रमुख थे । 1987-88 में वे आडवाणी की टीम के सदस्य थे. 1990-91 में मोदी गुजरात में भाजपा के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे आडवाणी की रथ-यात्र के प्रबंधक थे। 1991-92 में जोशी की एकता-यात्र में वे प्रमुख थे। 1987 में चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए वे संघ द्वारा पार्टी में भेजे गये थे। गुजरात में पहली बार भाजपा की सरकार 1995 में बनी थी। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। इस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे।

                     मोदीने सरकारी कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करना आरंभ किया, जबकि वे सरकार के अंग नहीं थे। राष्ट्रीय राजनीति में आडवाणी-जोशी की रथ-यात्र और एकता-यात्रा के कारण वे उपस्थित-चर्चित हुए थे। फिर मोदी ने अपना दबदबा कायम किया। शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी का विभाजन किया। नब्बे के दशक के मध्य में आडवाणी के आशीर्वाद के कारण मोदी को गुजरात का ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था। इसी समय उन्हें गुजरात से बाहर जाने को कहा गया। छह वर्ष बाद संघ ने उन्हें गुजरात में वापस लाकर सरकार की जिम्मेवारी सौंपी। राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी को केशुभाई पटेल द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के चार दिन पहले 30 सितंबर, 2001 को अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को दिल्ली छोड़ कर गुजरात जाने को कहा। 4 अक्तूबर, 2001 को मोदी विधायक दल के नेता चुने गये और 7 अक्तूबर को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस शपथ-समारोह में आडवाणी, जेटली, राजनाथ सिंह, सभी मौजूद थे। गुजरात विधानसभा का उन्होंने चुनाव लड़ा और वे विधायक बने। तब से अब तक के 13 वर्ष उनकी बुलंदियों के वर्ष हैं। उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । मोदी की कार्यशैली से सबकी असहमति रही है। सभी विरोधियों, चाहे वह संघ का कितना भी लाड़ला या पार्टी में कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, को चुन-चुन कर मोदी ने किनारे किया। असहमति प्रकट करनेवालों को उन्होंने कभी पसंद नहीं किया। अक्तूबर, 2001 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2002, 2007, 2012 में वे पुन: मुख्यमंत्री बने। दिसंबर, 2002 में विस चुनाव में जीत के बाद वे गुजरात में ‘राजनीतिक सुपरस्टार’ बने।

            14वेंलोकसभा चुनाव (2004) में भाजपा का ‘इंडिया शाइनिंग’ नहीं चला। तब से भाजपा ने विरोधी दल के रूप में ही अपनी भूमिका का निर्वाह किया है।  2014 के चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति पूर्णत: आशान्वित है। संघ ने दस वर्ष पहले समझ लिया था कि ‘हिंदुत्व’ कार्ड के बदले ‘विकास कार्ड’ अधिक प्रभावी, उपयोगी और सामयिक है। कांग्रेस-भाजपा का विकास का आर्थिक मॉडल एक है। विकास का ‘नमो फैक्टर’ ही नहीं, ‘ममो (मनमोहन) फैक्टर’ भी है। यूपीए-1 में कांग्रेस पर वाम दलों का अंकुश था। कांग्रेस मनमाने फैसले के लिए स्वतंत्र नहीं थी। मुसोलिनी ने ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत के विलीनीकरण’ को ‘फासीवाद’ कहा है और यह कांग्रेस के लिए संभव नहीं था कि वह ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत का विलीनीकरण’ कर दे ।कॉरपोरेट ने कांग्रेस से सारे लाभ लेकर उसे किनारे किया।

                 जनवरी 2009 में ही ‘वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन’ में अनिल अंबानी और सुनील मित्तल ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम सुझाया था। पहला ‘वाइब्रेंट गुजरात बिजनेस समिट’ 28 सितंबर-2 अक्तूबर, 2003 तक चला, जिसमें मोदी ने सच्चे गुजराती के रूप में अपनी छवि बनायी। तब से गुजरात के ‘विकास-मॉडल’ की बात की गयी है। 2009 के आरंभ से ही भारतीय कॉरपोरेट ने नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। अनिल अंबानी ने 2009 में ही कहा था- ‘उनके जैसे व्यक्ति के हाथ में ही अगली बार देश की बागडोर होनी चाहिए’ ।टाटा ने भी मोदी की प्रशंसा में कसीदे पढ़े। मात्र दो दिनों में ‘नैनो’ के लिए भूमि और सरकारी अनुमति मिल गयी।जनता की किसी भी समस्या का निदान इतने कम समय में क्या कहीं किया गया? जिया ग्लोबल कंपनी मोदी की कृपा से मात्र छह दिनों में 3200 रुपये से 10 हजार करोड़ रुपये की कंपनी हो गयी। 2011 के ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में मुकेश अंबानी ने मोदी को ‘दृढ़ निश्चयी और स्वप्नदर्शी नेता’ कहा। 2013 में अनिल अंबानी ने उन्हें ‘राजाओं का राजा’ कहा। कॉरपोरेट ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री बहुत पहले चुन लिया है। हरीश मैकडोनल्ड की पुस्तक ‘अंबानी एंड संस’ (2010) के पृष्ठ 7 की पंक्तियां हैं- ‘वह प्रधानमंत्री बना और हटा सकता है। अमेरिका में आप एक सुपर कॉरपोरेशन बना सकते हैं, लेकिन वहां राजनीतिक व्यवस्था बड़ी है।  भारत में व्यवस्था कमजोर है। अगर स्टॉक एक्सचेंज अंबानी को ‘एक्सपोज’ करने का साहस करता है, तो वह कंपनी के शेयर निकाल कर उसे ध्वस्त कर देगा। वह एक्सचेंज से बड़ा है। समाचारपत्र उसके विज्ञापनों पर निर्भर होने के कारण उसकी आलोचना नहीं कर सकते। उसके अपने आदमी सभी दलों में हैं। यह व्यवस्था के लिए खतरनाक है. वह अपराजेय है’।

                    मोदी भाजपा से बड़े हो चुके हैं। उनके साथ मीडिया और कॉरपोरेट है। मीडिया कॉरपोरेट और बड़ी पूंजी के अधीन है। यह चुनाव संघ, मीडिया और कॉरपोरेट तीनों मिल कर लड़ रहे थें। एक व्यक्ति के सामने संघ-भाजपा गौण हैं, क्योंकि वह एक ‘ब्रांड’ है, उसके साथ बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट हैं । निक्सन को ‘पैकेज्ड प्रेसिडेंट’ कहा गया था, क्या भारत का भावी प्रधानमंत्री ‘पैकेज्ड प्राइम मिनिस्टर’ होगा? इस चुनाव में बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट जीतेगा या हारेगा- फिलहाल नहीं कहा जा सकता । लेकिन यह चुनाव देश का भविष्य, भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी तय करेगा।

                   मोदी के कुछ कर गुजरने के दिन आ गए हैं... कांग्रेसी कुशासन और राजनीतिक विकल्पशून्यता के माहौल में आगे आए लफ्फाज मोदी की लंतरानियों ने कांग्रेस की बी टीम भाजपा को पूर्ण बहुमत दिला दिया । इस देश ने कई बार कई प्रदेशों में झूठे वादों-लफ्फाजियों के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकारों को बनते देखा और कुछ ही समय में नाकारा होने के कारण जनता से पिट कर शू्न्य में चले जाते देखा है...

                  सो, भाजपा और मोदी के लिए खुद को साबित करने के दिन हैं... अगर ये धर्म, जाति, संप्रदाय, हिंसा, नस्लवाद जैसी चीजों में फंस गए तो इनका जाना तय है... अगर इन्होंने खुद को उदात्त (जिसकी संभावना कम है) बनाते हुए भारत जैसे विविध संस्कृतियों व अनेक समझ वाले देश के आम जन के हित में सकारात्मक विकास कार्य (रोजगार, शिक्षा, सेहत, प्रति व्यक्ति आय आदि) किया तो आगे भी जनता इन्हें अपना समर्थन देगी । पर ऐसी संभावना इसलिए कम है क्योंकि भाजपा और संघ के मूल स्वभाव में नकारात्मकता और पूंजी परस्ती है । इसलिए कांग्रेसी कुशासन से मुक्ति का जश्न मनाते हुए एक नए किस्म के कुशासन में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार रखिए...

                   मेरी नजर में इस चुनाव ने आम आदमी पार्टी को शानदार मौका दे दिया है। उसे खुद को असली विपक्ष साबित करते हुए जमीनी स्तर पर काम करना चाहिए और अगले लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने की तैयारी करनी चाहिए।  इस तरह से देश में आम आदमी पार्टी और भाजपा नामक दो पार्टियां ही रह जाएगी। कांग्रेस सदा के लिए थर्ड नंबर की पार्टी बन जाएगी। कांग्रेस का अंत होना जरूरी है और आम आदमी पार्टी को एक प्रगतिशील जुझारू तेवर लेकर नया विकल्प बनना भी जरूरी है... चुनाव नतीजों का स्वागत करता हूं ।ऐतिहासिक जनादेश से गदगद मोदी अब क्या कुछ करते हैं कराते हैं, इस पर पूरे देश ही नहीं, पूरे संसार की गहरी नजर रहेगी। वो कहा जाता है न कि शिखर पर पहुंचना मुश्किल नही होता, शिखर को मेनटेन रख पाना बड़ा कठिन काम होता है । तो शिखर पुरुष बने मोदी कितने दिन तक इस उंचाई को बरकरार रख पाते हैं, यह भी देखा जाएगा। फिलहाल मेरी तरफ से मोदी और भाजपा को जीत की बधाई। आम आदमी पार्टी को असली विपक्ष का रोल निभाने के लिए अग्रिम शुभकामनाएं.

            शुभ रात्रि ।

Wednesday, May 14, 2014

अरविंद केजरीवाल और आज के अन्य नेता

नमस्ते दोस्तों,

           आज फिर से आपकी सेवा में आपका अपना राकेश गुप्ता अपनी कुछ विचारों के साथ प्रस्तुत है । आज मैंनें अनुभव किया कि क्यों ना वर्तमान में चल रहे दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महोत्सव आम चुनाव के बारे में कुछ लिखा जाय । आज की रचना मेरी तो नहीं है पर मैं इससे पूर्ण रुप से सहमत हूँ और आशा करता हँ कि आप भी होंगें। इस रचना के रचनाकार मनोज कुमार मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं। जिनके विचारों को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हुँ ।
         

                              वर्ष 2014 का चुनाव गरिमा खोते नेताओं के लिये याद रखा जाएगा। यह चुनाव इस बात के लिये भी कभी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसे मुद्दों पर राजनीति करने वाला गैर-पेशवर नेता मिला। इस बार के आम चुनाव में स्थापित राजनीति दल कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह मुद्दाविहिन रही। इनके पीछे खड़ी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी तो केवल उपस्थिति दर्ज कराती नजर आयीं। इन दोनों दलों का वैसा हस्तक्षेप आम चुनाव में नहीं देखने को मिला, जैसा कि पूर्ववर्ती चुनावों में हुआ करता था। अलबत्ता नई-नवेली आम आदमी पार्टी ने न केवल प्रजातांत्रिक रूप से सशक्त उपस्थिति दिखायी और हस्तक्षेप किया बल्कि कांग्रेस और भाजपा की परेशानी का सबब भी बन गयी।
        
                                  खैर मुद्दाविहिन राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को भटकाने और भरमाने के लिये एक-दूसरे की निजता पर हमले करना शुरू किया। व्यक्तिगत हमले तो चुनाव के मैदान में पहले भी होते रहे हैं लेकिन जिस तरह से निजता पर हमला किया गया, वह दुर्र्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। हर नेता दूसरे नेता की बीवी को तलाशने में लगा था। किसने किसको छोड़ा, कौन किसके साथ हनीमून मना रहा है और किससे किसकी शादी हो रही है, जैसे विषयों पर नेता पसीना बहाते दिखे। इनमें सबसे अलग दिखे तो आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल।

           दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत के इस बार के आम चुनाव में देश-दुनिया की आंखें टिकी हुई थी। संचार साधनों के विस्तार के साथ पल-पल की खबर ली जा रही थी। विश्व मंच पर भारत एक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ है, यह हमारे लिये गर्व की बात है लेकिन यह शर्मनाक है कि दुनिया के जिस बड़े लोकतंत्र के पहरूओं को हम चुनने जा रहे हैं, उनके पास मुद्दे नहीं हैं। वे इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि भारत की जनता की बुनियादी जरूरतों के साथ विश्व मंच पर भारत किस तरह से अपने आपको अलग और बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करेगा। वार्ड पार्षद के चुनाव में भी स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं और निजता पर हमला करने की कोई जरूरत नहीं होती है लेकिन देश की सत्ता की बागडोर सम्हालने का दावा करने वाली कांग्रेस और भाजपा समेत सारे दल एक-दूसरे की निजता पर हमला करने में जुटे हुये हैं।

              
                                             कांग्रेस ने जिस तरह से  भाजपा नेता नरेन्द्र भाई मोदी को तलाशने में जुटी तो ऐसा लगा कि मोदी देश के लिये नहीं, अपनी पत्नी के लिये चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने बकायदा हमला बोल कर यह कुतर्क देने की कोशिश की कि जो मोदी अपने घर को नहीं सम्हाल पा रहे हैं, वह देश क्या सम्हालेंगे। इस मामले में भाजपा भी पीछे नहीं रही। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की शादी को लेकर चुनाव के पहले से ही विधवा विलाप जारी है और इस चुनाव में भी उनके कुंवारेपन को मुद्दा बनाया गया। राहुल गांधी का किसके साथ चक्कर है, यह बात भी जानने में समय एवं धन खर्च किया गया। योग गुरु रामदेव ने तो राहुल गांधी पर ऐसे आरोप दागे कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया। आखिरी दौर में भाजपा ने कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह की उस प्रेमिका को भी ढूंढ़ निकाला जिससे वे जल्द ही शादी करने वाले हैं।
            
                              मोदी,राहुल या दिग्विजय सिंह की शादी करना न करना, कौन किससे मोहब्बत कर रहा है, नितांत निजी मामला है और इसे चुनाव का मुद्दा बनाया जाना राजनीतिक दलों की बेबसी बयान करता है। यह ठीक है कि देश की जनता को अपेक्षा है कि उनके नेताओं का जीवन साफ-सुथरा हो लेकिन उसकी रूचि कतई इस बात में नहीं है कि किसकी पत्नी किसके साथ रह रही है या कोई किससे शादी करने जा रहा है। यह विषय भी विवाद का तब होता जब कोई संविधान के विपरीत जाता। जनता की रूचि नेताओं की शादी ब्याह में होती तो अटल बिहारी वाजपेयी ताजिंदगी कुंवारे रहे लेकिन कभी किसी ने उनसे सवाल नहीं किया। वे बड़े कद के नेता हैं, उनकी सोच बड़ी है और वे देश का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। इसी तरह ममता बेनर्जी , मायावती और जयललिता के बारे में भी कोई सवाल नहीं किया गया। वे शादी की जिम्मेदारी उठाते हैं या नहीं, यह गौण बात है। असल तो यह है कि वे इस देश को, अपने प्रदेश को और समाज को कुछ दे पाते हैं या नहीं, यह महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति अपनी तरह की स्वतंत्र जिंदगी जी ले, इस बात की अनुमति भारतीय कानून देता है।
        
                                2014 का आमचुनाव बदजुबानी के लिये भी याद रखा जाएगा। एक नहीं, बल्कि चुनाव समर में उतरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी बदजुबानी से लोकतंत्र को दागदार किया है। करोड़ो रुपये चुनाव प्रचार में बहाते राजनीतिक दलों ने जुबान को भी बेलगाम कर दिया। मुलायमसिंह ने बलात्कारियों के पक्ष में जो कुछ कहा, वह लज्जाजनक है। कोई भी मुलायम के बयान की हिमायत नहीं करेगा तो मोदी की बदजुबानी ने इतिहास रचा है। कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह तो अपने बयानों के लिये चुनाव से पहले और चुनाव के दौर में हमेशा से चर्चा में रहे हैं, शायद ही कोई इस बात से इंकार करे। नेताओं की सोहबत में स्वयं को समाज का पहरेदार बताने वाले रामदेव ने राहुल गांधी पर जो टिप्पणी की है, वह उनकी विकृत मानसिकता का परिचायक है। रामदेव योग गुरु हैं तो उन्हें देशवासियों को सेहतमंद बनाने पर ध्यान देना चाहिये न कि राजनीति में आकर अपने बड़बोलेपन से सामाजिक समरसता को भंग करने की कोशिश।

                            रामदेव जैसे लोग बदजुबानी क्यों करते हैं, इस सवाल का जवाब सीधा सा है कि मीडिया उन्हें तव्वजो देता है। रामदेव या इस परम्परा के लोगों को पता है कि कुछ ऐसा विवादित बोल जाओ और देश की जनता के दिमाग पर छा जाओ। अरबों की जनसंख्या में लाखों के बीच दीवाने होने का यह फार्मूला कौन सा बुरा है जिसमें चवन्नी भी खर्च नहीं होता है। मीडिया के इस चरित्र पर अंगुली उठाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल आलोचना के शिकार हो गये। अरविंद ने मीडिया के बारे में जो कहा, उसे शत-प्रतिशत नहीं माना जा सकता है लेकिन जो कहा उसे शत-प्रतिशत अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। मुद्दों की बात करते आप नेता अरविंद इस आम चुनाव में बिरले दिखे।

          
                                दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने मुद्दों के साथ लड़ाई शुरू की तो अप्रत्याशित जीत उन्हें मिली। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद सत्ता छोड़ने की बात एक अलग विषय है लेकिन आम चुनाव में भी वे मुद्दों लेकर आम आदमी के बीच आये हैं। उन्हें अपने और देशवासियों पर भरोसा है और यही कारण है कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नहीं, एक जनप्रतिनिधि चुने जाने के लिये पूरे भरोसे के साथ एकमात्र सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये कि पूरे देश में आम आदमी पार्टी के एक दर्जन से अधिक लोग चुनकर संसद में पहुंचे। ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र के लिये स्वर्णिम दिन होगा क्योंकि सत्ता की चाबी कांग्रेस समर्थित दलों के पास होगी या भाजपा समर्थित दलों के पास। ऐसे में इनके मनमाने फैसलों को रोकने के लिये अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के कारिंदे स्पीडब्रेकर बन कर खड़े रहेंगे।
                    
                            यह तय है ऐसा होने से अरविंद को राजनीतिक माइलेज मिलेगा तो यह भी तय है कि इस माइलेज का लाभ देश के हित में होगा। यहां स्मरण कराना समीचीन होगा कि दिल्ली की सत्ता सम्हालने के बाद बिजली जैसे मुद्दों पर अरविंद के आक्रमक होने का ही परिणाम रहा कि देश के दूसरे राज्यों की सरकारें बिजली की कीमत बढ़ाने से पीछे हट गईं। अंबानी और अडानी के खिलाफ बोलना ही नहीं, हस्तक्षेप करने का साहस अरविंद ही दिखा सकते हैं तभी तो वे इस भीड़ में अकेले नजर आ रहे हैं।

                       

                                         अरविंद केजरीवाल मूल रूप से नेता नहीं हैं और न ही उन्हें विरासत में राजनीति मिली है। वे देश के लाखों-करोड़ों लोगों की तरह सर्विस क्लास से आते हैं लेकिन मन में व्यवस्था के प्रति भरा गुस्सा उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में खींच लाया। राजनीति करना उनके लिये एक बड़ी चुनौती है और वे इस चुनौती में स्वयं को साबित करने में सफल होते दिख रहे हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव परिणाम यह भी साबित करेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसा जुझारू नेता की जरूरत है या राजनीति में जमे उन मठाधीशों की जिनके पास न तो दृष्टि है और न ही दर्शन। देश को निराश होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि अल्पायु वाली आम आदमी पार्टी किसी राज्य में सिमट कर रहने के बजाय देशभर में चुनाव मैदान में उतरने का ताकत रखती है तो वह देश को दृष्टि और दिशा भी देगी। यह बात देश की जनता जानती है और संजीदा है। वह एक बार साबित कर देगी..यह पब्लिक है, सब जानती है...

Thursday, January 9, 2014

शोले 3D




हैलो दोस्तों,

बहुत दिनों के बाद एक बार फिर से आपकी सेवा में फिर से हाजिर हूँ अपने विचारों के साथ आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हमेशा की तरह आपकों मेरे विचार जरुर पसंद आयेंगें ।

अभी कुछ दिनों पहले मुझे वाराणसी जाने का अवसर मिला और मिला क्या कहिये अवसर निकाला । क्योंकि आज के व्यस्त जीवन शैली में कहाँ किसी को मौका है फुरसत के लम्हें जीने के । पर मैं ये अवसर खोना नहीं चाहता था । वैसे साल 2014 के प्रथम दिन ही मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ पार्टी के बारे में सोच रहा था पर कुछ कारणों से ऐसा हो ना सका और वाराणसी जाने और मुवी देखने की मेरी ख्वाहिश पुरी ना हो सकी । फिर मैने सोचा चलो कोई बात नहीं आज नहीं तो फिर कभी । और फिर कभी बहुत दुर नहीं बस पास में ही था और मुझे वाराणसी जाने तथा मुवी देखने का मौका मिला । हाँ ये अलग बात है कि मेरे साथ मेरे दोस्त नहीं थे फिर भी मैंनें मुवी को खुब enjoy किया । और मुवी थी -" शोले 3D "

वाराणसी के JHV MALL के धमाकेदार dolby sound के बीच शोले 3D में देखने का एक अलग ही मजा था ।ये मुवी मैंने ओरिजनल वर्जन में आज से लगभग दस साल पहले देखी थी , पर आज फिर से एक बार देखने पर ऐसा नहीं लगा कि मैं लगभग 40 साल पुरानी फिल्म देख रहा हूँ ।ऐसे ही नहीं इस क्लासिक फिल्म को सदाबहार फिल्म का दर्जा प्राप्त है ।
पहले बात करते हैं ओरिजनल वर्जन की । शोले 1975 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है । इसका नाम हिन्दुस्तान की सार्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार है तथा इसने कई आगामी फिल्मों के लिए एक प्रेरणास्रोत का काम किया ।शोले फ़िल्म 15 अगस्त, 1975 को रिलीज़ हुयी। शुरु के दो सप्ताह ये कुछ खास नही चली, पर तीसरे सप्ताह से ये रातो रात सन्सनी बन गयी। अंततः यह फ़िल्म 1975 की सर्वाधिक कमाई करने वाली फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म ने भारत मे लगातार मे लगातार 50 सप्ताह तक प्रदर्शन का कीर्तीमान भी बनाया। साथ ही यह फ़िल्म भारतीय फ़िल्मो के इतिहास मे ऐसी पहली फ़िल्म बनी, जिसने सौ से भी ज्यादा सिनेमा घरो मे रजत जयंती (25 सप्ताह) मनाई। मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर मे इसे लगातार 5 वर्षों तक प्रदर्शित किया गया।

अपने प्रथम के दौरान इसने 15 करोड रुपयों की कमाई की, जो कि इसकी 2 करोड की लागत से कई गुना था। अनुमान के मुताबिक, मंहगाई दर के आधार पर समायोजित करने पर यह फ़िल्म, भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास मे सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है।
डायरेक्टर केतन मेहता को पिछले साल शोले के डायरेक्टर रमेश सिप्पी के ग्रैंडसन साशा सिप्पी ने करीब साढे तीन घंटे लंबी इस पूरी फिल्म को 3डी तकनीक में बदलने के लिए अप्रोच किया। उस वक्त केतन ने साशा को समझाया बॉलिवुड की अब तक 3डी में बनी फिल्में दो से ढाई घंटे अवधि के बीच रही है, ऐसे में 207 मिनट की शोले को टोटली 3डी में तब्दील करना आसान टास्क नहीं होगा। खैर जब केतन को लगा साशा अपना फैसला नहीं बदलने वाले तब उन्होंने अपने माया स्टूडियो में इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। पर्दे पर सिर्फ एक सेकंड में नजर आने वाले 3डी सीन के लिए 24 फ्रेम बनाए जाते है, यानी 207 मिनट की शोले को 3डी करने के लिए 2.80 लाख फ्रेम बनाए गए।

करीब चार दशक पहले बॉक्स ऑफिस पर कमाई और कामयाबी का इतिहास रच चुकी शोले 3-डी में दर्शकों के सामने पहुंची है। दिल्ली, यूपी सहित देश भर के लगभग सभी मेजर सेंटरों पर शुक्रवार को फिल्म प्रदर्शित की गई। शोले 3डी ने पहले दिन टिकट खिड़की पर पचास से साठ फीसदी का बिजनेस करके उन आलोचकों को करारा जवाब दिया जो चालीस साल बाद दोबारा आ रही शोले 3डी को प्रॉडक्शन कंपनी के लिए घाटे का सौदा बता रहे थे।

कहानी-

रामगढ के ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) एक इंसपेक्टर है जिसने, एक डाकू सरगना गब्बर सिंह (अमज़द ख़ान) को पकड़कर जेल में डलवा दिया। पर गब्बर जेल से भाग निकलता है और ठाकुर के परिवार को बर्बाद कर देता है । इसका बदला लेने के लिए ठाकुर दो चोरों की मदद लेता है - जय (अमिताभ बच्चन) तथा वीरू (धर्मेन्द्र) ।

गब्बर के तीन साथी रामगढ के ग्रामीणों से अनाज लेने आते हैं, पर जय और वीरु की वजह से उन्हे खाली हाथ जाना पडता है। गब्बर उनके मात्र दो लोगो से हारने पर बहुत क्रोधित होता है और उन तीनो को मार डालता है। गब्बर होली के दिन गाँव पर हमला करता है और काफ़ी लडाई के बाद जय और वीरु को बंधक बना लेता है। ठाकुर उन्की मदद करने कि स्थीति मे होने पर भी उनकी मदद नही करता। किसी तरह जय और वीरु बच जाते है। तब ठाकुर उन्हे बताता है कि किस तरह कुछ समय पहले, उसने गब्बर को गिरफ्तार किया था पर वो जेल से भाग गया और ठाकुर के पूरे परिवार को मार डाला। बाद मे उसने ठाकुर को पकड कर उसके दोनो हाथ काट दिये।

रामगढ मे रहते हुये जय को ठाकुर की विधवा बहू राधा (जया बच्चन) और वीरु को बसन्ती (हेमा मालिनी) से प्यार हो जाता है।

बसन्ती और वीरु को गब्बर के आदमी पकड कर ले जाते है और जय उनको बचाने जाता है। लडाई मे जय को गोली लग जाती है। वीरु गब्बर के पीछे जाता है और उसे पकड लेता है।
मुख्य कलाकार-
धर्मेन्द्र - वीरू
संजीव कुमार - ठाकुर बलदेव सिंह (ठाकुर साहब)
हेमा मालिनी - बसंती
अमिताभ बच्चन - जय (जयदेव)
जाया भादुरी - राधा
अमज़द ख़ान - गब्बर सिंह
ए के हंगल - इमाम साहब/रहीम चाचा
सचिन - अहमद
सत्येन्द्र कपूर - रामलाल
इफ़्तेख़ार - नर्मलाजी, राधा के पिता
लीला मिश्रा - मौसी
विकास आनंद - जय और वीरू को लाने नियुक्त जेलर
पी जयराज - पुलिस कमिश्नर
असरानी - जेलर
राज किशोर - कैदी
मैक मोहन - साँभा
विजू खोटे - कालिया
कैस्टो मुखर्जी - हरिराम
हबीब - हीरा
शरद कुमार - निन्नी
मास्टर अलंकार - दीपक
गीता सिद्धार्थ - दीपक की माँ (अतिथि पात्र)
ओम शिवपुरी - इंस्पेक्टर साहब (अतिथि पात्र)
जगदीप - सूरमा भोपाली (अतिथि पात्र)
हेलन - बंजारा नर्तकी (अतिथि पात्र, 'महबूबा महबूबा' गाने में)
जलाल आग़ा -बंजारा गायक (अतिथि पात्र, 'महबूबा महबूबा' गाने में)
निर्देशक:-रमेश सिप्पी
लेखक:-जावेद अख्तर, सलीम ख़ान
निर्माता:- जी पी सिप्पी
छायांकन:- द्वारका दिवेचा
संपादक:- एम् एस शिंदे
कला निर्देशक:- राम येडेकर
स्टंट:- मोहम्मद अली, जेरी क्रांपटन
नृत्य निर्देशक:- पी एल राज
संगीतकार:- राहुल देव बर्मन
गीतकार:- आनंद बख्शी
पार्श्वगायक:- राहुल देव बर्मन, मन्ना डे, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, भूपेंद्र सिंह

ये तो रही पुरानी बात जो मैंनें विकिपिडिया से लिया और ctrl+c तथा ctrl+v किया। पर अब आते हैं मेरे विचारों पर जो मैंनें मुवी देखते हुये अनुभव किया ।
सबसे पहले जब मैं मुवी देखने गया तो सिर्फ और सिर्फ दो चीजों पर ध्यान था, पहला 3D और दुसरा sound । इन दो चीजों में ये फिल्म पुरा खरा उतरता हैं और पैसा वसुल का मुहर लग जाता है ।
70 एमएम के विशाल स्क्रीन पर आंखों पर 3डी का रंगीन चश्मा पहने जब मैने रामगढ़ वालों के बीच गब्बर सिंह से खौफ के सीन देखा तो एकबारगी हतप्रभ रह गया । यूं तो इस यादगार फिल्म में बाइस से ज्यादा ऐसे सीन है जो 3डी में कहर ढाते है, लेकिन मैं आपको शोले के उन चंद बेहतरीन 3 डी सीन के बारे में बताता हूँ जिनका जवाब नहीं-

1. ठाकुर ( संजीव कुमार) द्वारा मालगाड़ी में वीरू-जय को लेकर जाने वाले सीन के बाद ट्रेन पर डकैती का सीन। करीब नौ मिनट लंबे इस सीन में 3डी इफेक्टस गजब ढाते है। डाकुओं की ओर से निकलती गोलियों के बीच ट्रेन की छत पर फिल्माएं फाइट सीन देखकर मैं तो एकदम हैरान रह गया ।

2. गब्बर सिंह ( अमजद खान) का एंट्री सीन जहां वह रामगढ से मार खाने के बाद लौटे अपने तीन साथियों को ठहाकों के बाद गोलियों से उड़ाता है। गब्बर की गोली के बाद कालिया और गब्बर गैंग के दो डाकुओं का हवा के बीच गिरने वाले सीन में ठहाकों वाले सीन का साउंड इफेक्ट और थ्री डी के चश्मे से गब्बर को हाथों में खैनी रगड़ने का सीन देखने लायक है। ठहाके की आवाज से पुरा थियेटर गुंजने लगता है ।

3. रामगढ़ में वीरू का पानी की टंकी पर चढकर बसंती से अपने प्यार का इजहार करने वाले सीन में दारू की बोतल लिए वह एकदम मेरे पास नजर आया ।

4. गब्बर के डाकू गैंग से बसंती का अपने तांगे में बचकर निकलना और तेज रफ्तार से भागते तांगे को खींच रही धन्नो ( घोड़ी) पर चाबुकों की बौछार के बीच तांगे का पहिया निकलने वाले सीन का 3डी इफेक्ट किसी से कम नहीं।

5. होली के दिन गब्बर का रामगढ़ पर अटैक, फाइट सीन के बीच गब्बर की आंखों में जय द्वारा रंग डालने वाले सीन देख मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी आंखों में रंग डाल दिया हो।

6. गब्बर के अडडे पर बसंती का 'जब तक है जान मैं नाचूंगी...' पर डांस करने के दौरान डाकुओं द्वारा दारू की बोतलें तोड़ना, कांच पर खून से लथपथ नंगे पांव पर बसंती का नाच। गजब का सीन....वाह ।

7. रामगढ़ में गब्बर का ठाकुर के पूरे परिवार को गोलियों से भूनने वाले सीन में ठाकुर की एंट्री के सीन में ठाकुर के गुस्से का सीन और सबके मर जाने के बाद बच्चा के आने और झुले का अपने आप झुलने और उसकी आवाज ....वाह ।
8. लकडी के पुल पर बम के फटने का सीन का क्या कहना। ऐसा धमाका की मेरा दिल धक से रह गया, और कुछ देर तक मेरी आंखों के सामने शोले और लकडी के टुकडे गिरते हुए नजर आते रहें ।

इन सीन्स के अलावा वीरू का बसंती को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग वाला सीन ,फिल्म के क्लाइमेक्स में वीरू और जय का गब्बर के गैंग से भिड़ना जैसे कई ऐसे सीन है जो थ्रीडी तकनीक में देखने लायक हैं।

मुझे इस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी लगी । खास कर जय और राधा की खामोश प्रेम कथा । जो आज के तडक - भडक और सेक्स सीन से दुर एकदम शांत , सौम्य और दिल को छु लेने वाला है । जिसमें उन दोनो के बीच नाम मात्र का संवाद है। यहाँ तक की अपने प्यार का वो इजहार भी नहीं कर पाते , फिर भी एक सच्चा प्यार । ऐसा प्यार जो अपने परवान चढने से पहले ही खत्म हो गया । राधा जो विधावा है और उसके रंगहीन जीवन में जय का आना और उसके रंगहीन जीवन को रंगों से भरने से पहले ही खुद खत्म हो जाना । जय का मरना इस फिल्म का सबसे दुखद पहलु है जो हमें झकझोर कर रख देती है ।
लोग कहते हैं कि अच्छे के साथ हमेशा अच्छा होता है पर जय का हद से ज्यादा अच्छा होने के बावजुद भी उसके साथ बुरा होता है । और जाते जाते सबको रुला जाता है । जय की अच्छाई इस बात से झलकती है कि वो शुरु से लेकर अन्त तक सारे अच्छे फैसले लेता है, चाहे ठाकुर को गोली लगने पर अस्पताल पहुंचाने का फैसला, रामगढ जाने का फैसला या फिर अन्त में वीरु और बसन्ती के जान बचाने का फैसला , सब कुछ । पर लोगो को दिखाता है कि ये फैसला उसका नहीं नसीब का है, ऊपर वाले का है ...क्यों कि सारे फैसलों से पहले वो जो टास करता है उसका सिक्का ही खोटा है यानी कि दोनो तरफ से हेड ।इस फिल्म में वैसे तो सभी का अपना किरदार है पर जय ही इसका मुख्य नायक है । जो दोस्ती, प्यार और फर्ज सबका ध्यान रखता है ।

इस फिल्म की खाशियत इसके गाने भी हैं जो आज भी सुपरहिट हैं ।

फ़िल्म का संगीत राहुल देव बर्मन ने दिया था| इसमें एक गीत महबूबा मेहबूबा उन्होने ख़ुद गाया भी था जिसे हेलेन और जलाल आगा पर फ़िल्माया गया था| फ़िल्म के गीत आनन्द बक्शी ने लिखे थे।
गीत "महबूबा मेहबूबा" बिनाका गीत माला 1975 वार्षिक सूची पर 24वीं पायदान पर और 1976 वार्षिक सूची पर 5वीं पायदान पर रही|
गीत "कोई हसीना जब रूठ जाती है" बिनाका गीत माला की 1975 वार्षिक सूची पर 30वीं पायदान पर और 1976 वार्षिक सूची पर 20वीं पायदान पर रही|
गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" बिनाका गीत माला की 1976 वार्षिक सूची पर 9वीं पायदान पर रही|

"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" किशोर कुमार, मन्ना डे
"हाँ जबतक है जान" लता मंगेशकर
"कोई हसीना जब रूठ जाती है" किशोर कुमार, हेमा मालिनी
"होली के दिन दिल खिल जाते है" किशोर कुमार, लता मंगेशकर, सम्वेत स्वर
"महबूबा महबूबा" राहुल देव बर्मन
"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" (दुखद) किशोर कुमार 


मोबाइल की रिंगटोन पर भी "होली के दिन दिल खिल जाते..." के बगैर होली नही होती। वहीं "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे..." के बगैर तो फ्रेंडशिप डे" नहीं मनाया जाता।

मजबूत कथा, खटकेबाज डायलॉग, जीते-जागते साहसी दृश्य, चंबल के डाकुओं का चित्रण, गब्बर बने अमजद द्वारा संवादों की दमदार अदायगी, ठाकुर बने संजीवकुमार का जबर्दस्त अभिनय और उसे मिला अमिताभ और धर्मेंद्र का अचूक साथ। जया बच्चन और हेमा मालिनी के परस्पर विरोधी किरदारों का लाजवाब अभिनय कहानी के माफिक उम्दा संगीत और आरडी बर्मन के गीतों में और कहीं नजाकत भरे दृश्यों में माउथऑर्गन का लाजवाब इस्तेमाल उस पर हेलन का "मेहबूबा मेहबूबा" ऐसी तमाम खासियतें रहीं।

मुख्य किरदारों के साथ "साँबा", "कालिया" इन डाकुओं के किरदारों में मॅकमोहन और विजू खोटे की भी अलहदा पहचान कायम हुई। वहीं छोटे अहमद (सचिन) की डाकुओं द्वारा हत्या के करुण दृश्य में इमाम (एके हंगल) का भावपूर्ण अभिनय और पार्श्व में नमाज की अजान के सुर गमगीन माहौल की पेशकश का चरम बिंदु रहे।

बसंती को शादी के लिए राजी करते वीरू का "सुसाइड नोट", जय के जेब में दो अलहदा सिक्के, राधा की नजाकत भरी खामोशी, वहीं ठाकुर के हाथ काटने का दर्दनाक दृश्य, जेलर असरानी, केश्टो मुखर्जी और जगदीप के व्यंग्य ऐसे तमाम अलहदा रंगों से सजे "शोले" ने मेरा दिल जीत लिया ।

डायलाग :-
केवल शहर ही नहीं दूर दराज कस्बों में भी लोग इसके डायलॉग का मजा लेते थे। "कितने आदमी थे?" गब्बर यानी अमजद खान का यह डायलॉग इतना लोकप्रिय है कि आज भी मिमिक्री शोज में यह डायलॉग अलग-अलग कलाकार किस लहजे, अंदाज में बोलेंगे का प्रयोग आज भी तालियाँ हासिल करता है। इतना ही नहीं इस डायलॉग पर ही कई अलहदा तरह के व्यंग्यों की भी पेशकश होने लगी है।
कितने आदमी थे?
वो दो थे, और तुम तीन । फिर भी खाली हाथ लौट आये।
कितना इनाम रखे है, सरकार हम पर।
यहाँ से पचास पचास गाँवो में, जब बच्चा नहीं सोता हैं, तो माँ कहती हैं - सो जा बेटा नहीं तो गब्बर आ जायेगा।
बहुत नाइंसाफी हैं।
अब तेरा क्या होगा कालिया?
ये हाथ नहीं फाँसी का फंदा हैं।
ये हाथ हमको दे दे , ठाकुर।
तेरे लिए तो मेरे पैर ही काफी हैं।
तेरा नाम क्या है, बसंती?
बसंती, इन कुत्तो के सामने मत नाचना।
आधे दाये जाओ, आधे बाये , बाकी मेरे पीछे आओ।
हम अंग्र्जों के जमाने के जेलर हैं।
इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
सबसे हिट डायलोग :-
जो डर गया समझो मर गया !


अभी तो बहुत कुछ रह गया बताने को ....फिर भी यदि आपने अभी तक ये मुवी नही देखी तो एकबार जरुर देखिये....।