नमस्ते दोस्तों,
आज विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महापर्व का समापन उसके सुखद परिणाम के साथ हो गया और भारत को आगामी पाँच वर्ष के लिये एक मजबुत और स्थायी सरकार के रुप में मोदी सरकार मिल गया । इसे मोदी सरकार इसलिये कहा कि इस बार सरकार भारतीय जनता पार्टी की नहीं , मोदी की बनी है । और ये बात मैं ही नहीं पुरी दुनिया कह रही है क्योंकि "अबकी बार मोदी सरकार" ये पँचलाईन खुद मोदी सरकार ने ही शुरु से अंत तक अपने प्रचार के मुख्य हथियार के रुप में प्रयोग किया है । तो आईये आज अपने मोदी सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में कुछ बाते जानते हैं ।
वर्षो पहले धीरूभाई अंबानी ने नरेंद्र मोदी को ‘लंबी रेस का घोड़ा’ कहा था । अप्रैल, 2009 में रॉबर्ट डी कप्लान ने ‘दि अटलांटिक’ में लिखा था कि मोदी जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन और दोनों बुशों को करिश्मा में पीछे छोड़ते हैं, उन्हें मात देते हैं। 1 मई, 1960 की अर्धरात्रि में गुजरात राज्य के जन्म के बाद, बचपन में ही मोदी संघ परिवार से जुड़े ।1971 से 1986 के 15 वर्षो में संघ में उनका क्रमश: विकास हुआ। 1974 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। ‘बाल स्वयंसेवक’ से आरंभ हुई उनकी यात्र-कथा अनोखी-अनूठी है। मोदी को लेकर दो धारणाएं हैं- आलोचनात्मक और प्रशंसात्मक। उनके बारे में तटस्थ नहीं रहा जा सकता या तो उनका समर्थक हुआ जा सकता है या विरोधी। विलियम अंथोलीस के लेख का शीर्षक है - ‘इंडियाज मोस्ट एडमायर्ड एंड मोस्ट फीयर्ड पॉलिटिशियन : नरेंद्र मोदी.’ ।
संघ प्रचारक बनने के बाद अस्सी के दशक में वे गुजरात में विभाग प्रचारक, संभाग प्रचारक और उसके बाद संघ व्यवस्था प्रमुख अर्थात् प्रांत पदाधिकारी बने ।1987 तक भाजपा से संघ की दूरी थी. 1987 के बाद संघ के जो पूर्णकालिक प्रचारक भाजपा से जुड़े, उनमें नरेंद्र मोदी प्रमुख थे । 1987-88 में वे आडवाणी की टीम के सदस्य थे. 1990-91 में मोदी गुजरात में भाजपा के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे आडवाणी की रथ-यात्र के प्रबंधक थे। 1991-92 में जोशी की एकता-यात्र में वे प्रमुख थे। 1987 में चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए वे संघ द्वारा पार्टी में भेजे गये थे। गुजरात में पहली बार भाजपा की सरकार 1995 में बनी थी। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। इस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे।
मोदीने सरकारी कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करना आरंभ किया, जबकि वे सरकार के अंग नहीं थे। राष्ट्रीय राजनीति में आडवाणी-जोशी की रथ-यात्र और एकता-यात्रा के कारण वे उपस्थित-चर्चित हुए थे। फिर मोदी ने अपना दबदबा कायम किया। शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी का विभाजन किया। नब्बे के दशक के मध्य में आडवाणी के आशीर्वाद के कारण मोदी को गुजरात का ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था। इसी समय उन्हें गुजरात से बाहर जाने को कहा गया। छह वर्ष बाद संघ ने उन्हें गुजरात में वापस लाकर सरकार की जिम्मेवारी सौंपी। राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी को केशुभाई पटेल द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के चार दिन पहले 30 सितंबर, 2001 को अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को दिल्ली छोड़ कर गुजरात जाने को कहा। 4 अक्तूबर, 2001 को मोदी विधायक दल के नेता चुने गये और 7 अक्तूबर को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस शपथ-समारोह में आडवाणी, जेटली, राजनाथ सिंह, सभी मौजूद थे। गुजरात विधानसभा का उन्होंने चुनाव लड़ा और वे विधायक बने। तब से अब तक के 13 वर्ष उनकी बुलंदियों के वर्ष हैं। उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । मोदी की कार्यशैली से सबकी असहमति रही है। सभी विरोधियों, चाहे वह संघ का कितना भी लाड़ला या पार्टी में कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, को चुन-चुन कर मोदी ने किनारे किया। असहमति प्रकट करनेवालों को उन्होंने कभी पसंद नहीं किया। अक्तूबर, 2001 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2002, 2007, 2012 में वे पुन: मुख्यमंत्री बने। दिसंबर, 2002 में विस चुनाव में जीत के बाद वे गुजरात में ‘राजनीतिक सुपरस्टार’ बने।
14वेंलोकसभा चुनाव (2004) में भाजपा का ‘इंडिया शाइनिंग’ नहीं चला। तब से भाजपा ने विरोधी दल के रूप में ही अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। 2014 के चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति पूर्णत: आशान्वित है। संघ ने दस वर्ष पहले समझ लिया था कि ‘हिंदुत्व’ कार्ड के बदले ‘विकास कार्ड’ अधिक प्रभावी, उपयोगी और सामयिक है। कांग्रेस-भाजपा का विकास का आर्थिक मॉडल एक है। विकास का ‘नमो फैक्टर’ ही नहीं, ‘ममो (मनमोहन) फैक्टर’ भी है। यूपीए-1 में कांग्रेस पर वाम दलों का अंकुश था। कांग्रेस मनमाने फैसले के लिए स्वतंत्र नहीं थी। मुसोलिनी ने ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत के विलीनीकरण’ को ‘फासीवाद’ कहा है और यह कांग्रेस के लिए संभव नहीं था कि वह ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत का विलीनीकरण’ कर दे ।कॉरपोरेट ने कांग्रेस से सारे लाभ लेकर उसे किनारे किया।
जनवरी 2009 में ही ‘वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन’ में अनिल अंबानी और सुनील मित्तल ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम सुझाया था। पहला ‘वाइब्रेंट गुजरात बिजनेस समिट’ 28 सितंबर-2 अक्तूबर, 2003 तक चला, जिसमें मोदी ने सच्चे गुजराती के रूप में अपनी छवि बनायी। तब से गुजरात के ‘विकास-मॉडल’ की बात की गयी है। 2009 के आरंभ से ही भारतीय कॉरपोरेट ने नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। अनिल अंबानी ने 2009 में ही कहा था- ‘उनके जैसे व्यक्ति के हाथ में ही अगली बार देश की बागडोर होनी चाहिए’ ।टाटा ने भी मोदी की प्रशंसा में कसीदे पढ़े। मात्र दो दिनों में ‘नैनो’ के लिए भूमि और सरकारी अनुमति मिल गयी।जनता की किसी भी समस्या का निदान इतने कम समय में क्या कहीं किया गया? जिया ग्लोबल कंपनी मोदी की कृपा से मात्र छह दिनों में 3200 रुपये से 10 हजार करोड़ रुपये की कंपनी हो गयी। 2011 के ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में मुकेश अंबानी ने मोदी को ‘दृढ़ निश्चयी और स्वप्नदर्शी नेता’ कहा। 2013 में अनिल अंबानी ने उन्हें ‘राजाओं का राजा’ कहा। कॉरपोरेट ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री बहुत पहले चुन लिया है। हरीश मैकडोनल्ड की पुस्तक ‘अंबानी एंड संस’ (2010) के पृष्ठ 7 की पंक्तियां हैं- ‘वह प्रधानमंत्री बना और हटा सकता है। अमेरिका में आप एक सुपर कॉरपोरेशन बना सकते हैं, लेकिन वहां राजनीतिक व्यवस्था बड़ी है। भारत में व्यवस्था कमजोर है। अगर स्टॉक एक्सचेंज अंबानी को ‘एक्सपोज’ करने का साहस करता है, तो वह कंपनी के शेयर निकाल कर उसे ध्वस्त कर देगा। वह एक्सचेंज से बड़ा है। समाचारपत्र उसके विज्ञापनों पर निर्भर होने के कारण उसकी आलोचना नहीं कर सकते। उसके अपने आदमी सभी दलों में हैं। यह व्यवस्था के लिए खतरनाक है. वह अपराजेय है’।
मोदी भाजपा से बड़े हो चुके हैं। उनके साथ मीडिया और कॉरपोरेट है। मीडिया कॉरपोरेट और बड़ी पूंजी के अधीन है। यह चुनाव संघ, मीडिया और कॉरपोरेट तीनों मिल कर लड़ रहे थें। एक व्यक्ति के सामने संघ-भाजपा गौण हैं, क्योंकि वह एक ‘ब्रांड’ है, उसके साथ बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट हैं । निक्सन को ‘पैकेज्ड प्रेसिडेंट’ कहा गया था, क्या भारत का भावी प्रधानमंत्री ‘पैकेज्ड प्राइम मिनिस्टर’ होगा? इस चुनाव में बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट जीतेगा या हारेगा- फिलहाल नहीं कहा जा सकता । लेकिन यह चुनाव देश का भविष्य, भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी तय करेगा।
मोदी के कुछ कर गुजरने के दिन आ गए हैं... कांग्रेसी कुशासन और राजनीतिक विकल्पशून्यता के माहौल में आगे आए लफ्फाज मोदी की लंतरानियों ने कांग्रेस की बी टीम भाजपा को पूर्ण बहुमत दिला दिया । इस देश ने कई बार कई प्रदेशों में झूठे वादों-लफ्फाजियों के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकारों को बनते देखा और कुछ ही समय में नाकारा होने के कारण जनता से पिट कर शू्न्य में चले जाते देखा है...
सो, भाजपा और मोदी के लिए खुद को साबित करने के दिन हैं... अगर ये धर्म, जाति, संप्रदाय, हिंसा, नस्लवाद जैसी चीजों में फंस गए तो इनका जाना तय है... अगर इन्होंने खुद को उदात्त (जिसकी संभावना कम है) बनाते हुए भारत जैसे विविध संस्कृतियों व अनेक समझ वाले देश के आम जन के हित में सकारात्मक विकास कार्य (रोजगार, शिक्षा, सेहत, प्रति व्यक्ति आय आदि) किया तो आगे भी जनता इन्हें अपना समर्थन देगी । पर ऐसी संभावना इसलिए कम है क्योंकि भाजपा और संघ के मूल स्वभाव में नकारात्मकता और पूंजी परस्ती है । इसलिए कांग्रेसी कुशासन से मुक्ति का जश्न मनाते हुए एक नए किस्म के कुशासन में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार रखिए...
मेरी नजर में इस चुनाव ने आम आदमी पार्टी को शानदार मौका दे दिया है। उसे खुद को असली विपक्ष साबित करते हुए जमीनी स्तर पर काम करना चाहिए और अगले लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने की तैयारी करनी चाहिए। इस तरह से देश में आम आदमी पार्टी और भाजपा नामक दो पार्टियां ही रह जाएगी। कांग्रेस सदा के लिए थर्ड नंबर की पार्टी बन जाएगी। कांग्रेस का अंत होना जरूरी है और आम आदमी पार्टी को एक प्रगतिशील जुझारू तेवर लेकर नया विकल्प बनना भी जरूरी है... चुनाव नतीजों का स्वागत करता हूं ।ऐतिहासिक जनादेश से गदगद मोदी अब क्या कुछ करते हैं कराते हैं, इस पर पूरे देश ही नहीं, पूरे संसार की गहरी नजर रहेगी। वो कहा जाता है न कि शिखर पर पहुंचना मुश्किल नही होता, शिखर को मेनटेन रख पाना बड़ा कठिन काम होता है । तो शिखर पुरुष बने मोदी कितने दिन तक इस उंचाई को बरकरार रख पाते हैं, यह भी देखा जाएगा। फिलहाल मेरी तरफ से मोदी और भाजपा को जीत की बधाई। आम आदमी पार्टी को असली विपक्ष का रोल निभाने के लिए अग्रिम शुभकामनाएं.
शुभ रात्रि ।
आज विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महापर्व का समापन उसके सुखद परिणाम के साथ हो गया और भारत को आगामी पाँच वर्ष के लिये एक मजबुत और स्थायी सरकार के रुप में मोदी सरकार मिल गया । इसे मोदी सरकार इसलिये कहा कि इस बार सरकार भारतीय जनता पार्टी की नहीं , मोदी की बनी है । और ये बात मैं ही नहीं पुरी दुनिया कह रही है क्योंकि "अबकी बार मोदी सरकार" ये पँचलाईन खुद मोदी सरकार ने ही शुरु से अंत तक अपने प्रचार के मुख्य हथियार के रुप में प्रयोग किया है । तो आईये आज अपने मोदी सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में कुछ बाते जानते हैं ।
वर्षो पहले धीरूभाई अंबानी ने नरेंद्र मोदी को ‘लंबी रेस का घोड़ा’ कहा था । अप्रैल, 2009 में रॉबर्ट डी कप्लान ने ‘दि अटलांटिक’ में लिखा था कि मोदी जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन और दोनों बुशों को करिश्मा में पीछे छोड़ते हैं, उन्हें मात देते हैं। 1 मई, 1960 की अर्धरात्रि में गुजरात राज्य के जन्म के बाद, बचपन में ही मोदी संघ परिवार से जुड़े ।1971 से 1986 के 15 वर्षो में संघ में उनका क्रमश: विकास हुआ। 1974 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। ‘बाल स्वयंसेवक’ से आरंभ हुई उनकी यात्र-कथा अनोखी-अनूठी है। मोदी को लेकर दो धारणाएं हैं- आलोचनात्मक और प्रशंसात्मक। उनके बारे में तटस्थ नहीं रहा जा सकता या तो उनका समर्थक हुआ जा सकता है या विरोधी। विलियम अंथोलीस के लेख का शीर्षक है - ‘इंडियाज मोस्ट एडमायर्ड एंड मोस्ट फीयर्ड पॉलिटिशियन : नरेंद्र मोदी.’ ।
संघ प्रचारक बनने के बाद अस्सी के दशक में वे गुजरात में विभाग प्रचारक, संभाग प्रचारक और उसके बाद संघ व्यवस्था प्रमुख अर्थात् प्रांत पदाधिकारी बने ।1987 तक भाजपा से संघ की दूरी थी. 1987 के बाद संघ के जो पूर्णकालिक प्रचारक भाजपा से जुड़े, उनमें नरेंद्र मोदी प्रमुख थे । 1987-88 में वे आडवाणी की टीम के सदस्य थे. 1990-91 में मोदी गुजरात में भाजपा के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे आडवाणी की रथ-यात्र के प्रबंधक थे। 1991-92 में जोशी की एकता-यात्र में वे प्रमुख थे। 1987 में चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए वे संघ द्वारा पार्टी में भेजे गये थे। गुजरात में पहली बार भाजपा की सरकार 1995 में बनी थी। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। इस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे।
मोदीने सरकारी कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करना आरंभ किया, जबकि वे सरकार के अंग नहीं थे। राष्ट्रीय राजनीति में आडवाणी-जोशी की रथ-यात्र और एकता-यात्रा के कारण वे उपस्थित-चर्चित हुए थे। फिर मोदी ने अपना दबदबा कायम किया। शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी का विभाजन किया। नब्बे के दशक के मध्य में आडवाणी के आशीर्वाद के कारण मोदी को गुजरात का ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था। इसी समय उन्हें गुजरात से बाहर जाने को कहा गया। छह वर्ष बाद संघ ने उन्हें गुजरात में वापस लाकर सरकार की जिम्मेवारी सौंपी। राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी को केशुभाई पटेल द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के चार दिन पहले 30 सितंबर, 2001 को अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को दिल्ली छोड़ कर गुजरात जाने को कहा। 4 अक्तूबर, 2001 को मोदी विधायक दल के नेता चुने गये और 7 अक्तूबर को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस शपथ-समारोह में आडवाणी, जेटली, राजनाथ सिंह, सभी मौजूद थे। गुजरात विधानसभा का उन्होंने चुनाव लड़ा और वे विधायक बने। तब से अब तक के 13 वर्ष उनकी बुलंदियों के वर्ष हैं। उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । मोदी की कार्यशैली से सबकी असहमति रही है। सभी विरोधियों, चाहे वह संघ का कितना भी लाड़ला या पार्टी में कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, को चुन-चुन कर मोदी ने किनारे किया। असहमति प्रकट करनेवालों को उन्होंने कभी पसंद नहीं किया। अक्तूबर, 2001 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2002, 2007, 2012 में वे पुन: मुख्यमंत्री बने। दिसंबर, 2002 में विस चुनाव में जीत के बाद वे गुजरात में ‘राजनीतिक सुपरस्टार’ बने।
14वेंलोकसभा चुनाव (2004) में भाजपा का ‘इंडिया शाइनिंग’ नहीं चला। तब से भाजपा ने विरोधी दल के रूप में ही अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। 2014 के चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति पूर्णत: आशान्वित है। संघ ने दस वर्ष पहले समझ लिया था कि ‘हिंदुत्व’ कार्ड के बदले ‘विकास कार्ड’ अधिक प्रभावी, उपयोगी और सामयिक है। कांग्रेस-भाजपा का विकास का आर्थिक मॉडल एक है। विकास का ‘नमो फैक्टर’ ही नहीं, ‘ममो (मनमोहन) फैक्टर’ भी है। यूपीए-1 में कांग्रेस पर वाम दलों का अंकुश था। कांग्रेस मनमाने फैसले के लिए स्वतंत्र नहीं थी। मुसोलिनी ने ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत के विलीनीकरण’ को ‘फासीवाद’ कहा है और यह कांग्रेस के लिए संभव नहीं था कि वह ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत का विलीनीकरण’ कर दे ।कॉरपोरेट ने कांग्रेस से सारे लाभ लेकर उसे किनारे किया।
जनवरी 2009 में ही ‘वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन’ में अनिल अंबानी और सुनील मित्तल ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम सुझाया था। पहला ‘वाइब्रेंट गुजरात बिजनेस समिट’ 28 सितंबर-2 अक्तूबर, 2003 तक चला, जिसमें मोदी ने सच्चे गुजराती के रूप में अपनी छवि बनायी। तब से गुजरात के ‘विकास-मॉडल’ की बात की गयी है। 2009 के आरंभ से ही भारतीय कॉरपोरेट ने नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। अनिल अंबानी ने 2009 में ही कहा था- ‘उनके जैसे व्यक्ति के हाथ में ही अगली बार देश की बागडोर होनी चाहिए’ ।टाटा ने भी मोदी की प्रशंसा में कसीदे पढ़े। मात्र दो दिनों में ‘नैनो’ के लिए भूमि और सरकारी अनुमति मिल गयी।जनता की किसी भी समस्या का निदान इतने कम समय में क्या कहीं किया गया? जिया ग्लोबल कंपनी मोदी की कृपा से मात्र छह दिनों में 3200 रुपये से 10 हजार करोड़ रुपये की कंपनी हो गयी। 2011 के ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में मुकेश अंबानी ने मोदी को ‘दृढ़ निश्चयी और स्वप्नदर्शी नेता’ कहा। 2013 में अनिल अंबानी ने उन्हें ‘राजाओं का राजा’ कहा। कॉरपोरेट ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री बहुत पहले चुन लिया है। हरीश मैकडोनल्ड की पुस्तक ‘अंबानी एंड संस’ (2010) के पृष्ठ 7 की पंक्तियां हैं- ‘वह प्रधानमंत्री बना और हटा सकता है। अमेरिका में आप एक सुपर कॉरपोरेशन बना सकते हैं, लेकिन वहां राजनीतिक व्यवस्था बड़ी है। भारत में व्यवस्था कमजोर है। अगर स्टॉक एक्सचेंज अंबानी को ‘एक्सपोज’ करने का साहस करता है, तो वह कंपनी के शेयर निकाल कर उसे ध्वस्त कर देगा। वह एक्सचेंज से बड़ा है। समाचारपत्र उसके विज्ञापनों पर निर्भर होने के कारण उसकी आलोचना नहीं कर सकते। उसके अपने आदमी सभी दलों में हैं। यह व्यवस्था के लिए खतरनाक है. वह अपराजेय है’।
मोदी भाजपा से बड़े हो चुके हैं। उनके साथ मीडिया और कॉरपोरेट है। मीडिया कॉरपोरेट और बड़ी पूंजी के अधीन है। यह चुनाव संघ, मीडिया और कॉरपोरेट तीनों मिल कर लड़ रहे थें। एक व्यक्ति के सामने संघ-भाजपा गौण हैं, क्योंकि वह एक ‘ब्रांड’ है, उसके साथ बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट हैं । निक्सन को ‘पैकेज्ड प्रेसिडेंट’ कहा गया था, क्या भारत का भावी प्रधानमंत्री ‘पैकेज्ड प्राइम मिनिस्टर’ होगा? इस चुनाव में बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट जीतेगा या हारेगा- फिलहाल नहीं कहा जा सकता । लेकिन यह चुनाव देश का भविष्य, भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी तय करेगा।
मोदी के कुछ कर गुजरने के दिन आ गए हैं... कांग्रेसी कुशासन और राजनीतिक विकल्पशून्यता के माहौल में आगे आए लफ्फाज मोदी की लंतरानियों ने कांग्रेस की बी टीम भाजपा को पूर्ण बहुमत दिला दिया । इस देश ने कई बार कई प्रदेशों में झूठे वादों-लफ्फाजियों के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकारों को बनते देखा और कुछ ही समय में नाकारा होने के कारण जनता से पिट कर शू्न्य में चले जाते देखा है...
सो, भाजपा और मोदी के लिए खुद को साबित करने के दिन हैं... अगर ये धर्म, जाति, संप्रदाय, हिंसा, नस्लवाद जैसी चीजों में फंस गए तो इनका जाना तय है... अगर इन्होंने खुद को उदात्त (जिसकी संभावना कम है) बनाते हुए भारत जैसे विविध संस्कृतियों व अनेक समझ वाले देश के आम जन के हित में सकारात्मक विकास कार्य (रोजगार, शिक्षा, सेहत, प्रति व्यक्ति आय आदि) किया तो आगे भी जनता इन्हें अपना समर्थन देगी । पर ऐसी संभावना इसलिए कम है क्योंकि भाजपा और संघ के मूल स्वभाव में नकारात्मकता और पूंजी परस्ती है । इसलिए कांग्रेसी कुशासन से मुक्ति का जश्न मनाते हुए एक नए किस्म के कुशासन में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार रखिए...
मेरी नजर में इस चुनाव ने आम आदमी पार्टी को शानदार मौका दे दिया है। उसे खुद को असली विपक्ष साबित करते हुए जमीनी स्तर पर काम करना चाहिए और अगले लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने की तैयारी करनी चाहिए। इस तरह से देश में आम आदमी पार्टी और भाजपा नामक दो पार्टियां ही रह जाएगी। कांग्रेस सदा के लिए थर्ड नंबर की पार्टी बन जाएगी। कांग्रेस का अंत होना जरूरी है और आम आदमी पार्टी को एक प्रगतिशील जुझारू तेवर लेकर नया विकल्प बनना भी जरूरी है... चुनाव नतीजों का स्वागत करता हूं ।ऐतिहासिक जनादेश से गदगद मोदी अब क्या कुछ करते हैं कराते हैं, इस पर पूरे देश ही नहीं, पूरे संसार की गहरी नजर रहेगी। वो कहा जाता है न कि शिखर पर पहुंचना मुश्किल नही होता, शिखर को मेनटेन रख पाना बड़ा कठिन काम होता है । तो शिखर पुरुष बने मोदी कितने दिन तक इस उंचाई को बरकरार रख पाते हैं, यह भी देखा जाएगा। फिलहाल मेरी तरफ से मोदी और भाजपा को जीत की बधाई। आम आदमी पार्टी को असली विपक्ष का रोल निभाने के लिए अग्रिम शुभकामनाएं.
शुभ रात्रि ।
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really nice
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