नमस्ते दोस्तों,
आज की चर्चा ना चुनाव और ना ही उम्मिदवार के बारे में है , आज की चर्चा हमारे देश के नये प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में है। आम चुनावों में मोदी को मिली जबरदस्त सफलता ने मैनेजमेंट पढ़ा रहे कॉलेजों का ध्यान खींचा है। विवि के इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (आईएमएस) ने मोदी के चुनावी अभियान को ब्रांडिंग और मार्केटिंग का बड़ा उदाहरण मानकर केस स्टडी शुरू करने की घोषणा की है। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) ने भी इसे अध्ययन का विषय माना है। आईएमएस के प्लेसमेंट ऑफिसर, शिक्षकों और छात्रों के दल ने 'द मेकिंग ऑफ ब्रांड नमो' शीर्षक से केस स्टडी पर काम शुरू कर दिया है। प्लेसमेंट ऑफिसर निशिकांत वाइकर, अवनीश व्यास और शिक्षक दिव्या पुरोहित के साथ चार विद्यार्थियों की टीम ने मैनेजमेंट की नजर से मोदी के चुनावी अभियान का विश्लेषण शुरू कर दिया है।

आईएमएस के शिक्षकों के अनुसार देश के इतिहास में मोदी का चुनावी अभियान अब तक का सबसे बड़ा पॉलिटिकल ब्रांडिंग और मार्केटिंग कैंपेन था। किसी ब्रांड को कैसे आम लोगों के बीच स्थापित किया जाए, यह इससे सीखा जा सकता है। डेढ़ साल पहले से मोदी की गतिविधियों को मैनेजमेंट के अध्ययन में शामिल किया जा रहा है। डॉ.वाइकर के अनुसार भाजपा में गडकरी के अध्यक्ष पद छोड़ने के साथ ही मोदी को ब्रांड बनाने का अभियान शुरू हुआ था। मोदी ने अमिताभ और पीयूष पांडे जैसे ब्रांड मेकर्स के साथ वाइब्रेंट गुजरात का नारा गढ़ा और खुद को भाजपा में ब्रांड बनाने की शुरुआत की। गुजरात मॉडल को पार्टी के भीतर उपलब्धि के तौर पर पेश कर खुद को नेशनल लीडर के रूप में स्वीकार करवाया। केस स्टडी में कैंपेन की प्रारंभिक रणनीति इसे ही माना जा सकता है।
स्टडी तैयार कर रहे आईएमएस के जसरीन कौर, चंदन अरोरा, अभिनव चौरसिया और अंकित श्रीवास्तव के अनुसार ब्रांडिंग की सही रणनीति के दम पर मोदी ने पहले पार्टी में खुद को राष्ट्रीय नेता स्वीकार करवाया। इसके बाद अहमदाबाद में 170 लोगों की टीम मोदी की ब्रांडिंग में लगी रही। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान मोदी ने खुद की तमाम खासियतें लोगों तक पहुंचाई। इसके लिए मिक्स मीडिया का उपयोग किया गया। इसमें सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सीधे सवांद करना भी शामिल था। यह अच्छा उदाहरण है कि किसी ब्रांड को स्थापित करने के लिए लोगों तक पहुंचा कैसे जा सकता है।
''अब की बार मोदी सरकार" नारे को मनोवैज्ञानिक असर पैदा करने वाला मानकर मार्केटिंग के हिसाब से मुफीद माना जा रहा है। मैनेजमेंट के शिक्षकों के अनुसार 1996 में भाजपा ने नारा दिया था 'सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी’, उस वर्ष भी भाजपा को सत्ता मिली थी। नारे में किसी नाम का शुमार होना लोगों को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रभावित करता है। नारे गढ़ने की इस कला से किसी उत्पाद के लिए अच्छी टैग लाइन बनाना सीख सकते हैं।
आईआईएम इंदौर के मीडिया ऑफिसर डॉ.अख्तर परवेज के अनुसार मोदी का प्रचार अभियान सबसे लंबा चला। कपड़ों से लेकर सीने पर लगे कमल और ट्वीट तक को कस्टमर यानी मतदाताओं के लिहाज से तैयार करवाया गया। विविधताओं वाले देश में अभियान सफल रहा लिहाजा मीडिया का ब्रांड बिल्डिंग में कैसे सही उपयोग किया जाए, ये सारी बातें इस चुनावी अभियान से सीखी जा सकती हैं। आईआईएम के छात्र भी निश्चित रूप से इस पर स्टडी करेंगे।
नमस्ते दोस्तों,
आज विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महापर्व का समापन उसके सुखद परिणाम के साथ हो गया और भारत को आगामी पाँच वर्ष के लिये एक मजबुत और स्थायी सरकार के रुप में मोदी सरकार मिल गया । इसे मोदी सरकार इसलिये कहा कि इस बार सरकार भारतीय जनता पार्टी की नहीं , मोदी की बनी है । और ये बात मैं ही नहीं पुरी दुनिया कह रही है क्योंकि "अबकी बार मोदी सरकार" ये पँचलाईन खुद मोदी सरकार ने ही शुरु से अंत तक अपने प्रचार के मुख्य हथियार के रुप में प्रयोग किया है । तो आईये आज अपने मोदी सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के बारे में कुछ बाते जानते हैं ।
.jpg)
वर्षो पहले धीरूभाई अंबानी ने नरेंद्र मोदी को ‘लंबी रेस का घोड़ा’ कहा था । अप्रैल, 2009 में रॉबर्ट डी कप्लान ने ‘दि अटलांटिक’ में लिखा था कि मोदी जिमी कार्टर, बिल क्लिंटन और दोनों बुशों को करिश्मा में पीछे छोड़ते हैं, उन्हें मात देते हैं। 1 मई, 1960 की अर्धरात्रि में गुजरात राज्य के जन्म के बाद, बचपन में ही मोदी संघ परिवार से जुड़े ।1971 से 1986 के 15 वर्षो में संघ में उनका क्रमश: विकास हुआ। 1974 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। ‘बाल स्वयंसेवक’ से आरंभ हुई उनकी यात्र-कथा अनोखी-अनूठी है। मोदी को लेकर दो धारणाएं हैं- आलोचनात्मक और प्रशंसात्मक। उनके बारे में तटस्थ नहीं रहा जा सकता या तो उनका समर्थक हुआ जा सकता है या विरोधी। विलियम अंथोलीस के लेख का शीर्षक है - ‘इंडियाज मोस्ट एडमायर्ड एंड मोस्ट फीयर्ड पॉलिटिशियन : नरेंद्र मोदी.’ ।
संघ प्रचारक बनने के बाद अस्सी के दशक में वे गुजरात में विभाग प्रचारक, संभाग प्रचारक और उसके बाद संघ व्यवस्था प्रमुख अर्थात् प्रांत पदाधिकारी बने ।1987 तक भाजपा से संघ की दूरी थी. 1987 के बाद संघ के जो पूर्णकालिक प्रचारक भाजपा से जुड़े, उनमें नरेंद्र मोदी प्रमुख थे । 1987-88 में वे आडवाणी की टीम के सदस्य थे. 1990-91 में मोदी गुजरात में भाजपा के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे आडवाणी की रथ-यात्र के प्रबंधक थे। 1991-92 में जोशी की एकता-यात्र में वे प्रमुख थे। 1987 में चुनावी राजनीति में भाग लेने के लिए वे संघ द्वारा पार्टी में भेजे गये थे। गुजरात में पहली बार भाजपा की सरकार 1995 में बनी थी। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। इस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव थे।
मोदीने सरकारी कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करना आरंभ किया, जबकि वे सरकार के अंग नहीं थे। राष्ट्रीय राजनीति में आडवाणी-जोशी की रथ-यात्र और एकता-यात्रा के कारण वे उपस्थित-चर्चित हुए थे। फिर मोदी ने अपना दबदबा कायम किया। शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी का विभाजन किया। नब्बे के दशक के मध्य में आडवाणी के आशीर्वाद के कारण मोदी को गुजरात का ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था। इसी समय उन्हें गुजरात से बाहर जाने को कहा गया। छह वर्ष बाद संघ ने उन्हें गुजरात में वापस लाकर सरकार की जिम्मेवारी सौंपी। राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी को केशुभाई पटेल द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के चार दिन पहले 30 सितंबर, 2001 को अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को दिल्ली छोड़ कर गुजरात जाने को कहा। 4 अक्तूबर, 2001 को मोदी विधायक दल के नेता चुने गये और 7 अक्तूबर को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ।वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस शपथ-समारोह में आडवाणी, जेटली, राजनाथ सिंह, सभी मौजूद थे। गुजरात विधानसभा का उन्होंने चुनाव लड़ा और वे विधायक बने। तब से अब तक के 13 वर्ष उनकी बुलंदियों के वर्ष हैं। उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । मोदी की कार्यशैली से सबकी असहमति रही है। सभी विरोधियों, चाहे वह संघ का कितना भी लाड़ला या पार्टी में कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, को चुन-चुन कर मोदी ने किनारे किया। असहमति प्रकट करनेवालों को उन्होंने कभी पसंद नहीं किया। अक्तूबर, 2001 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2002, 2007, 2012 में वे पुन: मुख्यमंत्री बने। दिसंबर, 2002 में विस चुनाव में जीत के बाद वे गुजरात में ‘राजनीतिक सुपरस्टार’ बने।
14वेंलोकसभा चुनाव (2004) में भाजपा का ‘इंडिया शाइनिंग’ नहीं चला। तब से भाजपा ने विरोधी दल के रूप में ही अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। 2014 के चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति पूर्णत: आशान्वित है। संघ ने दस वर्ष पहले समझ लिया था कि ‘हिंदुत्व’ कार्ड के बदले ‘विकास कार्ड’ अधिक प्रभावी, उपयोगी और सामयिक है। कांग्रेस-भाजपा का विकास का आर्थिक मॉडल एक है। विकास का ‘नमो फैक्टर’ ही नहीं, ‘ममो (मनमोहन) फैक्टर’ भी है। यूपीए-1 में कांग्रेस पर वाम दलों का अंकुश था। कांग्रेस मनमाने फैसले के लिए स्वतंत्र नहीं थी। मुसोलिनी ने ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत के विलीनीकरण’ को ‘फासीवाद’ कहा है और यह कांग्रेस के लिए संभव नहीं था कि वह ‘राज्यसत्ता और कॉरपोरेट जगत का विलीनीकरण’ कर दे ।कॉरपोरेट ने कांग्रेस से सारे लाभ लेकर उसे किनारे किया।
जनवरी 2009 में ही ‘वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन’ में अनिल अंबानी और सुनील मित्तल ने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम सुझाया था। पहला ‘वाइब्रेंट गुजरात बिजनेस समिट’ 28 सितंबर-2 अक्तूबर, 2003 तक चला, जिसमें मोदी ने सच्चे गुजराती के रूप में अपनी छवि बनायी। तब से गुजरात के ‘विकास-मॉडल’ की बात की गयी है। 2009 के आरंभ से ही भारतीय कॉरपोरेट ने नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। अनिल अंबानी ने 2009 में ही कहा था- ‘उनके जैसे व्यक्ति के हाथ में ही अगली बार देश की बागडोर होनी चाहिए’ ।टाटा ने भी मोदी की प्रशंसा में कसीदे पढ़े। मात्र दो दिनों में ‘नैनो’ के लिए भूमि और सरकारी अनुमति मिल गयी।जनता की किसी भी समस्या का निदान इतने कम समय में क्या कहीं किया गया? जिया ग्लोबल कंपनी मोदी की कृपा से मात्र छह दिनों में 3200 रुपये से 10 हजार करोड़ रुपये की कंपनी हो गयी। 2011 के ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में मुकेश अंबानी ने मोदी को ‘दृढ़ निश्चयी और स्वप्नदर्शी नेता’ कहा। 2013 में अनिल अंबानी ने उन्हें ‘राजाओं का राजा’ कहा। कॉरपोरेट ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री बहुत पहले चुन लिया है। हरीश मैकडोनल्ड की पुस्तक ‘अंबानी एंड संस’ (2010) के पृष्ठ 7 की पंक्तियां हैं- ‘वह प्रधानमंत्री बना और हटा सकता है। अमेरिका में आप एक सुपर कॉरपोरेशन बना सकते हैं, लेकिन वहां राजनीतिक व्यवस्था बड़ी है। भारत में व्यवस्था कमजोर है। अगर स्टॉक एक्सचेंज अंबानी को ‘एक्सपोज’ करने का साहस करता है, तो वह कंपनी के शेयर निकाल कर उसे ध्वस्त कर देगा। वह एक्सचेंज से बड़ा है। समाचारपत्र उसके विज्ञापनों पर निर्भर होने के कारण उसकी आलोचना नहीं कर सकते। उसके अपने आदमी सभी दलों में हैं। यह व्यवस्था के लिए खतरनाक है. वह अपराजेय है’।
मोदी भाजपा से बड़े हो चुके हैं। उनके साथ मीडिया और कॉरपोरेट है। मीडिया कॉरपोरेट और बड़ी पूंजी के अधीन है। यह चुनाव संघ, मीडिया और कॉरपोरेट तीनों मिल कर लड़ रहे थें। एक व्यक्ति के सामने संघ-भाजपा गौण हैं, क्योंकि वह एक ‘ब्रांड’ है, उसके साथ बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट हैं । निक्सन को ‘पैकेज्ड प्रेसिडेंट’ कहा गया था, क्या भारत का भावी प्रधानमंत्री ‘पैकेज्ड प्राइम मिनिस्टर’ होगा? इस चुनाव में बाजार, मीडिया और कॉरपोरेट जीतेगा या हारेगा- फिलहाल नहीं कहा जा सकता । लेकिन यह चुनाव देश का भविष्य, भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी तय करेगा।
मोदी के कुछ कर गुजरने के दिन आ गए हैं... कांग्रेसी कुशासन और राजनीतिक विकल्पशून्यता के माहौल में आगे आए लफ्फाज मोदी की लंतरानियों ने कांग्रेस की बी टीम भाजपा को पूर्ण बहुमत दिला दिया । इस देश ने कई बार कई प्रदेशों में झूठे वादों-लफ्फाजियों के आधार पर पूर्ण बहुमत की सरकारों को बनते देखा और कुछ ही समय में नाकारा होने के कारण जनता से पिट कर शू्न्य में चले जाते देखा है...
सो, भाजपा और मोदी के लिए खुद को साबित करने के दिन हैं... अगर ये धर्म, जाति, संप्रदाय, हिंसा, नस्लवाद जैसी चीजों में फंस गए तो इनका जाना तय है... अगर इन्होंने खुद को उदात्त (जिसकी संभावना कम है) बनाते हुए भारत जैसे विविध संस्कृतियों व अनेक समझ वाले देश के आम जन के हित में सकारात्मक विकास कार्य (रोजगार, शिक्षा, सेहत, प्रति व्यक्ति आय आदि) किया तो आगे भी जनता इन्हें अपना समर्थन देगी । पर ऐसी संभावना इसलिए कम है क्योंकि भाजपा और संघ के मूल स्वभाव में नकारात्मकता और पूंजी परस्ती है । इसलिए कांग्रेसी कुशासन से मुक्ति का जश्न मनाते हुए एक नए किस्म के कुशासन में प्रवेश करने के लिए खुद को तैयार रखिए...
मेरी नजर में इस चुनाव ने आम आदमी पार्टी को शानदार मौका दे दिया है। उसे खुद को असली विपक्ष साबित करते हुए जमीनी स्तर पर काम करना चाहिए और अगले लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने की तैयारी करनी चाहिए। इस तरह से देश में आम आदमी पार्टी और भाजपा नामक दो पार्टियां ही रह जाएगी। कांग्रेस सदा के लिए थर्ड नंबर की पार्टी बन जाएगी। कांग्रेस का अंत होना जरूरी है और आम आदमी पार्टी को एक प्रगतिशील जुझारू तेवर लेकर नया विकल्प बनना भी जरूरी है... चुनाव नतीजों का स्वागत करता हूं ।ऐतिहासिक जनादेश से गदगद मोदी अब क्या कुछ करते हैं कराते हैं, इस पर पूरे देश ही नहीं, पूरे संसार की गहरी नजर रहेगी। वो कहा जाता है न कि शिखर पर पहुंचना मुश्किल नही होता, शिखर को मेनटेन रख पाना बड़ा कठिन काम होता है । तो शिखर पुरुष बने मोदी कितने दिन तक इस उंचाई को बरकरार रख पाते हैं, यह भी देखा जाएगा। फिलहाल मेरी तरफ से मोदी और भाजपा को जीत की बधाई। आम आदमी पार्टी को असली विपक्ष का रोल निभाने के लिए अग्रिम शुभकामनाएं.
शुभ रात्रि ।
नमस्ते दोस्तों,
आज फिर से आपकी सेवा में आपका अपना राकेश गुप्ता अपनी कुछ विचारों के साथ प्रस्तुत है । आज मैंनें अनुभव किया कि क्यों ना वर्तमान में चल रहे दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के सबसे बडे महोत्सव आम चुनाव के बारे में कुछ लिखा जाय । आज की रचना मेरी तो नहीं है पर मैं इससे पूर्ण रुप से सहमत हूँ और आशा करता हँ कि आप भी होंगें। इस रचना के रचनाकार मनोज कुमार मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं। जिनके विचारों को मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हुँ ।

वर्ष 2014 का चुनाव गरिमा खोते नेताओं के लिये याद रखा जाएगा। यह चुनाव इस बात के लिये भी कभी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसे मुद्दों पर राजनीति करने वाला गैर-पेशवर नेता मिला। इस बार के आम चुनाव में स्थापित राजनीति दल कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह मुद्दाविहिन रही। इनके पीछे खड़ी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी तो केवल उपस्थिति दर्ज कराती नजर आयीं। इन दोनों दलों का वैसा हस्तक्षेप आम चुनाव में नहीं देखने को मिला, जैसा कि पूर्ववर्ती चुनावों में हुआ करता था। अलबत्ता नई-नवेली आम आदमी पार्टी ने न केवल प्रजातांत्रिक रूप से सशक्त उपस्थिति दिखायी और हस्तक्षेप किया बल्कि कांग्रेस और भाजपा की परेशानी का सबब भी बन गयी।
खैर मुद्दाविहिन राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को भटकाने और भरमाने के लिये एक-दूसरे की निजता पर हमले करना शुरू किया। व्यक्तिगत हमले तो चुनाव के मैदान में पहले भी होते रहे हैं लेकिन जिस तरह से निजता पर हमला किया गया, वह दुर्र्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। हर नेता दूसरे नेता की बीवी को तलाशने में लगा था। किसने किसको छोड़ा, कौन किसके साथ हनीमून मना रहा है और किससे किसकी शादी हो रही है, जैसे विषयों पर नेता पसीना बहाते दिखे। इनमें सबसे अलग दिखे तो आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल।
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाले भारत के इस बार के आम चुनाव में देश-दुनिया की आंखें टिकी हुई थी। संचार साधनों के विस्तार के साथ पल-पल की खबर ली जा रही थी। विश्व मंच पर भारत एक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ है, यह हमारे लिये गर्व की बात है लेकिन यह शर्मनाक है कि दुनिया के जिस बड़े लोकतंत्र के पहरूओं को हम चुनने जा रहे हैं, उनके पास मुद्दे नहीं हैं। वे इस बात के लिये तैयार नहीं हैं कि भारत की जनता की बुनियादी जरूरतों के साथ विश्व मंच पर भारत किस तरह से अपने आपको अलग और बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करेगा। वार्ड पार्षद के चुनाव में भी स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं और निजता पर हमला करने की कोई जरूरत नहीं होती है लेकिन देश की सत्ता की बागडोर सम्हालने का दावा करने वाली कांग्रेस और भाजपा समेत सारे दल एक-दूसरे की निजता पर हमला करने में जुटे हुये हैं।
कांग्रेस ने जिस तरह से भाजपा नेता नरेन्द्र भाई मोदी को तलाशने में जुटी तो ऐसा लगा कि मोदी देश के लिये नहीं, अपनी पत्नी के लिये चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने बकायदा हमला बोल कर यह कुतर्क देने की कोशिश की कि जो मोदी अपने घर को नहीं सम्हाल पा रहे हैं, वह देश क्या सम्हालेंगे। इस मामले में भाजपा भी पीछे नहीं रही। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की शादी को लेकर चुनाव के पहले से ही विधवा विलाप जारी है और इस चुनाव में भी उनके कुंवारेपन को मुद्दा बनाया गया। राहुल गांधी का किसके साथ चक्कर है, यह बात भी जानने में समय एवं धन खर्च किया गया। योग गुरु रामदेव ने तो राहुल गांधी पर ऐसे आरोप दागे कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया। आखिरी दौर में भाजपा ने कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह की उस प्रेमिका को भी ढूंढ़ निकाला जिससे वे जल्द ही शादी करने वाले हैं।
मोदी,राहुल या दिग्विजय सिंह की शादी करना न करना, कौन किससे मोहब्बत कर रहा है, नितांत निजी मामला है और इसे चुनाव का मुद्दा बनाया जाना राजनीतिक दलों की बेबसी बयान करता है। यह ठीक है कि देश की जनता को अपेक्षा है कि उनके नेताओं का जीवन साफ-सुथरा हो लेकिन उसकी रूचि कतई इस बात में नहीं है कि किसकी पत्नी किसके साथ रह रही है या कोई किससे शादी करने जा रहा है। यह विषय भी विवाद का तब होता जब कोई संविधान के विपरीत जाता। जनता की रूचि नेताओं की शादी ब्याह में होती तो अटल बिहारी वाजपेयी ताजिंदगी कुंवारे रहे लेकिन कभी किसी ने उनसे सवाल नहीं किया। वे बड़े कद के नेता हैं, उनकी सोच बड़ी है और वे देश का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। इसी तरह ममता बेनर्जी , मायावती और जयललिता के बारे में भी कोई सवाल नहीं किया गया। वे शादी की जिम्मेदारी उठाते हैं या नहीं, यह गौण बात है। असल तो यह है कि वे इस देश को, अपने प्रदेश को और समाज को कुछ दे पाते हैं या नहीं, यह महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति अपनी तरह की स्वतंत्र जिंदगी जी ले, इस बात की अनुमति भारतीय कानून देता है।
2014 का आमचुनाव बदजुबानी के लिये भी याद रखा जाएगा। एक नहीं, बल्कि चुनाव समर में उतरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी बदजुबानी से लोकतंत्र को दागदार किया है। करोड़ो रुपये चुनाव प्रचार में बहाते राजनीतिक दलों ने जुबान को भी बेलगाम कर दिया। मुलायमसिंह ने बलात्कारियों के पक्ष में जो कुछ कहा, वह लज्जाजनक है। कोई भी मुलायम के बयान की हिमायत नहीं करेगा तो मोदी की बदजुबानी ने इतिहास रचा है। कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह तो अपने बयानों के लिये चुनाव से पहले और चुनाव के दौर में हमेशा से चर्चा में रहे हैं, शायद ही कोई इस बात से इंकार करे। नेताओं की सोहबत में स्वयं को समाज का पहरेदार बताने वाले रामदेव ने राहुल गांधी पर जो टिप्पणी की है, वह उनकी विकृत मानसिकता का परिचायक है। रामदेव योग गुरु हैं तो उन्हें देशवासियों को सेहतमंद बनाने पर ध्यान देना चाहिये न कि राजनीति में आकर अपने बड़बोलेपन से सामाजिक समरसता को भंग करने की कोशिश।
रामदेव जैसे लोग बदजुबानी क्यों करते हैं, इस सवाल का जवाब सीधा सा है कि मीडिया उन्हें तव्वजो देता है। रामदेव या इस परम्परा के लोगों को पता है कि कुछ ऐसा विवादित बोल जाओ और देश की जनता के दिमाग पर छा जाओ। अरबों की जनसंख्या में लाखों के बीच दीवाने होने का यह फार्मूला कौन सा बुरा है जिसमें चवन्नी भी खर्च नहीं होता है। मीडिया के इस चरित्र पर अंगुली उठाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल आलोचना के शिकार हो गये। अरविंद ने मीडिया के बारे में जो कहा, उसे शत-प्रतिशत नहीं माना जा सकता है लेकिन जो कहा उसे शत-प्रतिशत अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। मुद्दों की बात करते आप नेता अरविंद इस आम चुनाव में बिरले दिखे।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्होंने मुद्दों के साथ लड़ाई शुरू की तो अप्रत्याशित जीत उन्हें मिली। दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद सत्ता छोड़ने की बात एक अलग विषय है लेकिन आम चुनाव में भी वे मुद्दों लेकर आम आदमी के बीच आये हैं। उन्हें अपने और देशवासियों पर भरोसा है और यही कारण है कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नहीं, एक जनप्रतिनिधि चुने जाने के लिये पूरे भरोसे के साथ एकमात्र सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये कि पूरे देश में आम आदमी पार्टी के एक दर्जन से अधिक लोग चुनकर संसद में पहुंचे। ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र के लिये स्वर्णिम दिन होगा क्योंकि सत्ता की चाबी कांग्रेस समर्थित दलों के पास होगी या भाजपा समर्थित दलों के पास। ऐसे में इनके मनमाने फैसलों को रोकने के लिये अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के कारिंदे स्पीडब्रेकर बन कर खड़े रहेंगे।
यह तय है ऐसा होने से अरविंद को राजनीतिक माइलेज मिलेगा तो यह भी तय है कि इस माइलेज का लाभ देश के हित में होगा। यहां स्मरण कराना समीचीन होगा कि दिल्ली की सत्ता सम्हालने के बाद बिजली जैसे मुद्दों पर अरविंद के आक्रमक होने का ही परिणाम रहा कि देश के दूसरे राज्यों की सरकारें बिजली की कीमत बढ़ाने से पीछे हट गईं। अंबानी और अडानी के खिलाफ बोलना ही नहीं, हस्तक्षेप करने का साहस अरविंद ही दिखा सकते हैं तभी तो वे इस भीड़ में अकेले नजर आ रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल मूल रूप से नेता नहीं हैं और न ही उन्हें विरासत में राजनीति मिली है। वे देश के लाखों-करोड़ों लोगों की तरह सर्विस क्लास से आते हैं लेकिन मन में व्यवस्था के प्रति भरा गुस्सा उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में खींच लाया। राजनीति करना उनके लिये एक बड़ी चुनौती है और वे इस चुनौती में स्वयं को साबित करने में सफल होते दिख रहे हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव परिणाम यह भी साबित करेगा कि देश को अरविंद केजरीवाल जैसा जुझारू नेता की जरूरत है या राजनीति में जमे उन मठाधीशों की जिनके पास न तो दृष्टि है और न ही दर्शन। देश को निराश होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि अल्पायु वाली आम आदमी पार्टी किसी राज्य में सिमट कर रहने के बजाय देशभर में चुनाव मैदान में उतरने का ताकत रखती है तो वह देश को दृष्टि और दिशा भी देगी। यह बात देश की जनता जानती है और संजीदा है। वह एक बार साबित कर देगी..यह पब्लिक है, सब जानती है...